प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम महान क्रांतिकारी महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऊदा देवी के बारे में बात करने जा रहे है जिन्हें हम उदय देवी पासी के नाम से भी जानते है। लखनऊ विद्रोह के दौरान उन्होंने एक गुप्त बंदूक निशाने के बाज जिसे अंग्रेजी में स्नाइपर भी कहते है की भूमिका निभा थी।
उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके कार्यों के हमारे द्वारा भुलाया जा सके। लखनऊ विद्रोह के दौरान उनकी अहम भूमिका थी।
जीवन परिचय
उदय देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजियरांव जिसे वर्तमान समय में गोमती नगर एक साधारण गरीब परिवार में हुआ था। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज बहुत कम मिल पायें हैं जिनके कारण उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल पायी है। बताया यह भी जाता है कि उस समय काल के दौरान आम और गरीब तबके के स्वतंत्रता सेनानियों का लिखित ब्योरा कम ही रखा जाता था।
ऊदा देवी का विवाह मक्का पासी से हुआ था जो कि अपने समय के जाने माने पहलवान थे और अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सेना में सैनिक थे। विवाह के बाद उन्होंने लखनऊ में समाज संघर्ष को काफी करीब से देखा था। जब ब्रिटिश सेना ने अवध के नवाब को उनके पद से हटा दिया और लखनऊ में ब्रिटिश राज की स्थापना की।
तब लखनऊ में ब्रिटिश राज के खिलाफ असंतोष फैल गया जिसके परिणामस्वरूप लखनऊ विद्रोह की शुरुआत हुई। इस समय काल के दौरान ऊदा देवी के परिवार पर भी इस संघर्ष का गहरा असर पड़ा। 1857 को विद्रोह के दौरान जब ब्रिटिश सेना ने लखनऊ की रेजिडेंसी को घेर लिया और भीषण संघर्ष छेड़ दिया तब ऊदा देवी ने चुपचाप अपनी भूमिका तैयार की विद्रोहियों के साथ युद्ध में शामिल हुईं।
इस प्रकार उन्होंने तथा अन्य वीर महिलाओं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में अपने भूमिका अदा की।
विद्रोह की घटना
1857 की वर्षा ऋतु में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभुत्व के विरुद्ध दिल्ली झांसी और कानपुर के क्षेत्रों में एक व्यापक विद्रोह भड़का इस विद्रोह के दौरान ही लखनऊ में भी विद्रोह भड़का जिसके तहत विद्रोहियों ने लखनऊ को विद्रोहियों ने घेर लिया
इस बीच लखनऊ में 2200 ब्रिटिश सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी गोमती नदी के किनारे विद्रोहियों से घिरी हुई थी और उनके पास पर्याप्त राशन समाप्त हो गया था। जिसके कारण भूख से मरने की अपेक्षा ब्रिटिश सैनिकों का राहत दस्ता आगे बढ़ा जिनके पास पर्याप्त हथियारों की भी कमी थी का सामना ऊदा देवी की विद्रोही सेना से होता है।
सिकंदर बाग का युद्ध
क्रांतिकारी ऊदा देवी ने 16 नवंबर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई में हिस्सा लिया था। वे अपनी बटालियन को निर्देश देने के बाद स्वयं एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं और आगे बढ़ते ब्रिटिश सैनिकों पर गोलीबारी शुरु कर दी। एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें देख लिया वे उस समय अपने सहयोगियों को निर्देश दे रही थी साथ ही उन्हें भी गोलियों से कई घाव लगे थे।
अतः अंग्रेजों द्वारा देखे जाने के कारण उन्हें गुप्त स्नाइपर समझ कर ब्रिटिश अधिकारियों ने पेड़ की तरफ सैनिकों को गोली चालने का आदेश दिया जिसके परिणामस्वरूप ऊदा देवी जमीन पर गिरकर मारीं गईं। इस घटना का वृतांत देते हुए विलिय फोर्ब्स मिटचेल अपनी किताब रेमिनिसेंस आफ द ग्रेट म्यूटिनी में लिखते है कि वे दो भारी पुराने पैटर्न की घुड़सवार सेना पिस्तौल से लैस थीं जिनमें से एक अभी भी भरी हुई थी और उनकी बैल्ट में लटक रही थी।
और उनकी गोलियों की थैली अभी भी आधी भरी हुई थी जबकि हमले से पहले सावधानी पूर्वक तैयार किए गए अपने ठिकाने से उन्होंने लगभग आधे दर्जन से अधिक लोगों को मार गिराया था।
भारत सरकार द्वारा उनके नाम पर किए कार्य
उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर 20 मार्च 2021 को प्रांतीय सशस्त्र आरक्षित पुलिस बल महिला बटालियन की स्थापना की जिसे हम PAC के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही सरकार ने घोषणा की कि ऊदा देवी के साथ ही रानी अवंतीबाई झलकारीबाई के नाम पर भी पीएसी महिला बटालियन की स्थापना की जायेगी।
इस सभी बयान यूपी सरकार के तत्कालीन मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा रानी अवंतीबाई लोधी की पुण्य तिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम सभा को संबोधित करते हुए कहा गया।
हाल ही में लखनऊ में वीरांगना ऊदा देवी के शौर्य को चिरस्थाई बनाने के लिए उनकी भव्य प्रतिमा की स्थापना सिकंदर बाग और वृंदावन कालोनी क्षेत्र के पास स्थापित की गई है जिसका अनावरण यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी द्वारा किया गया है।
इसके साथ ही नई पीढ़ी को देश के गुमनाम नायकों और स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जोड़ने के लिए बेसिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रम की किताबों में उनके जीवन और संघर्ष से जुड़े अध्यायों को शामिल किया गया है।
हर साल 16 नवंबर को उनके बलिदान दिवस के दिन सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जहां देश के बड़े नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनके बलिदान को याद करते हुए उन्हें नमन करते है।
खास बात यह भी है कि वर्तमान समय में सरकार द्वारा उन सभी ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों का पुनरुद्धार कराया जा रहा है जिनका संबंध 1857 की क्रांति और स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जुड़ा हुआ है।
उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी उनके सम्मान में कार्य किए गए है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के महू छावनी में उनकी मूर्ति की स्थापना और लोकार्पण किया गया है ताकि देश उनको स्मरण रख सके।
उनके नाम पर एक पंजीकृत सामाजिक संगठन की स्थापना की गई है ताकि उनके आदर्शों महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के विचारों को आगे बढ़ाया जा सके।
निष्कर्ष
ऊदा देवी का जीवन यह सिद्ध करता है कि देश की स्वतंत्रता के लिए केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी उतनी ही आक्रामकता और वीरता से आगे आईं। सिकंदर बाग के पेड़ पर बैठकर अकेले ही ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे कर देना उनके अदम्य साहस का सर्वोच्च उदाहरण है।
वे समाज के उस वंचित और शोषित वर्ग से आती थीं जिन्हें पारंपरिक इतिहास में लंबे समय तक उचित स्थान नहीं मिल पाया था। उनका संघर्ष यह बताता है कि देश की आजादी में हर वर्ग और हर जाति के लोगों ने बराबर का बलिदान दिया है।
इसके साथ ही ऊदा देवी जैसी वीरांगनाओं का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास के पन्नों को पहचानना और सम्मन देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी वर्तमान स्थिति को अग्रसर किया।
उनका जीवन आज की पीढ़ी और विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनका बलिदान सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के खिलाफ डटकर मुकाबला कैसे किया जाता है। सरकार और समाज द्वारा उनके नाम पर बनाई गई बटालियन और मूर्तियां और स्मारक केवल उनके नाम को ही जीवित नहीं रखते बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश प्रेम और देश भक्ति का निरंतर पाठ पढ़ाते रहेंगे।

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