Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

2026-10-09

द्वितीय एंग्लो-सिख विद्रोह

illustration of second anglo sikh war

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम पंजाब के सिख साम्राज्य द्वारा लड़े द्वितीय एंग्लो-सिख युद्ध बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम युद्ध के मुख्य कारण तथा प्रमुख घटनाओं पर भी विचार करेंगे तथा इस युद्ध के मुख्य पात्रों जिन्होंने इस युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी के बारे में जानेंगे।

इस युद्ध के परिणाम के चलते सिख साम्राज्य पूर्ण रुप से ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हो गया था सिख साम्राज्य का पुरी तरह से पतन हो गया। यह युद्ध एक प्रकार से एक बहाना था जबकि अंग्रेज महाराजा रणजीत सिंह के समय काल से ही पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में विलय करने के प्रयास कर रहे थे। 

हलांकि उनके जीते जी उनके मनसूबे पूरे न हो सके। मगर उनके मरते ही अंग्रेजों ने सिख साम्राज्य में सेंध लगाना प्रारम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप उनके बेटों की रहस्यमय तरीकों से मौतों का सिलसिला प्रारम्भ हो गया।

अंत में सिख साम्राज्य के अंतिम शासक राजा दलीप सिंह गद्दी पर बैठे जो कि 5 वर्ष के बालक थे। मौके का फायदा उठाते हुए ब्रिटिश सेना ने युद्ध करना प्रारम्भ किया। जिसमें सिख सेना पहला एंग्लो-सिख युद्ध हार गए। 

परिचय

यह युद्ध 18 अप्रैल 1848 से प्रारम्भ हो कर 3 मार्च 1849 तक चला। युद्ध के प्रारम्भिक कारणों में प्रथम अंग्ल सिख युद्ध के बाद सिखों पर थोपी गई अपमानजनक शर्तें और असंतोष था इसके साथ ही रानी जिंद कौर को अपमानजनक तरीके से सत्ता से निष्कासित कर बनारस भेजा जाना था। जिसके चलते मुल्तान गवर्नर मुल राज ने विद्रोह किया। दूसरी तरफ छत्तर सिंह और शेर सिंह द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कर दी।

मुल्तान की विद्रोह

इस क्षेत्र को राजा रणजीत सिंह ने 1818 में अपने कब्जे में लिया और 1848 में पंजाबी वायसराय दीवान मुल राज को मुल्तान का शासन सौंपा। प्रथम एंग्लो सिख युद्ध की समाप्ति के बाद जब  ब्रिटिश नियंत्रित दरबार ने उनसे बढ़े हुए कर और बकाया राजस्व का भुगतान करने को कहा तो मुल राज ने अपने परिवार के शासक पद को बनाए रखने के लिए सत्ता अपने पुत्र को सौंपने का प्रयास किया। 

दूसरी तरफ ब्रिटिश सेना सरदार कहान सिंह मान को अपना राज्यपाल नियुक्त किया।कर वसूली के लिए कहान सिंह मान के साथ ब्रिटिश एजेंट लेफ्टिनेंट पैट्रिक वैन्स एग्यू को एक अन्य अधिकारी को साथ भेजा। 18 अप्रैल 1848 को दोनों अधिकारी एक छोटे से अंगरक्षक दल के साथ मुल्तान पहुंचे।

मुल राज ने चाबियां तो सौंप दी मगर जैसे ही अंगरक्षकों ने कब्जा करने का प्रयास किया तैसे ही उन पर मूल राज के सैनिकों ने तथा शहर से आयी भीड़ ने हमला कर दिया दोनों अधिकारी घायल हो गए कहान सिंह ने उन्हें बचाया और शहर के बाहर एक मस्जिद में ले जाकर छिपा दिया।

कहान सिंह के अंगरक्षक मुल राज के पक्ष में चले गए और अगले दिन भीड़ ने दोनों अधिकारियों की हत्या कर दी। हलांकि मूल राज ने ऐसा करने के लिए किसी को प्रेरित नहीं किया था लेकिन इन्हीं कारणों के चलते मूल राज को अंग्रेजों के प्रति विद्रोह करना पड़ा। 

अतः वंस अग्रेव का सिर कहान सिंह को दिया और उसे लाहौर ले जाने को कहा। इन हत्याओं की खबर पूरे पंजाब में फैल गयी। इस घटना के बाद बड़ी संख्या में सिख सैनिक ब्रिटिश दरबार के प्रति वफादारी छोड़ कर मूल राज के साथ विद्रोह करने के लिए तैयार हो गए।

किन्येरी का विद्रोह

जब वान्स एग्न्यू की हत्या हुई तब लेफ्टिनेंट हर्बर्ट एडवर्डस मुल्तान के पास ही थे मगर वे उसे बचाने में असफल रहा। इसने जल्दबाजी में कुछ पख्तून सैनिकों की भर्ती की। इसके बाद 18 जून 1848 में फतेह मोहम्मद खान के नेतृत्व में 8000 बहावल पिरियों ने लेफ्टिनेंट एडवर्सन के नेतृत्व में तथा 

कुछ 3000 अनियमित सिख सैनिकों की सहायता से रंग राम के नेतृत्व में 8000 सिखों से युद्ध किया। बहावलपुरियों को  सिख सैनिकों को हमले से अपने ठिकानों से पीछे हटना पड़ा।

लेकिन लेफ्टिनेंट हर्बर्ट एडवर्डस  की तोपों के आने से सिखों पर अंग्रेज भारी पड़े। दूसरे प्रयास में सिखों ने खईयों पर धावा बोला जिसके चलते अंग्रेजों के 300 सैनिक मारे गए दूसरी तरफ सिखों के 500 सैनिक शहीद है गए। अंत सिखों को पीछे हटना पड़ा मुल्तान भागते हुए कई सिख शहीद हो गए।

लेख अधुरा है जल्द ही अपडेट हो जायेगा

कोई टिप्पणी नहीं: