प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम त्रावणकोर के राजा तथा डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के मध्य हुए कोलचल के युद्ध तथा युद्ध के प्रमुख कारणों पर चर्चा की गई। इसके साथ ही डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के पतन के प्रमुख कारणों पर बात करी गई है। अंत यूद्ध के परिणामों पर विस्तार से बताया गया है।
परिचय
यह युद्ध त्रावणकोर के राजा मार्तनंड वर्मा तथा डच ईस्ट इण्डिया कम्पनी के संचालक वैल इम्बोफ के बीच हुआ था। युद्ध की शुरुआत कुछ इस प्रकार होती है कि 18वीं शताब्दी के समय काल में वर्तमान केरल का मालाबार तट कई छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था जिसे 1730 के दशक में त्रावणकोर का राजा मार्तंड वर्मा ने विस्तार वादी नीति अपना कर इन छोटे-छोटे राज्यों पर विजय हासिल करके इन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी का मसाला व्यापार इन्हीं छोटे-छोटे राज्यों पर निर्भर था। दरअसल कंपनी इन्हीं राज्यों से मसाला खरीद कर अन्य देशों में बेचा करती थी।
परिणामस्वरूप त्रावणकोर के राजा द्वारा इन क्षेत्रों पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के कारण इनका व्यापार रुक गया। हलांकि कंपनी ने वार्ता को दौरान इसे जारी रखने को कहा मगर मार्तड वर्मा तथा उनके सामंतों ने उनके एकाधिकार अनुबंधों को मानने से इनकार कर दिया। बढ़ती समस्याओं को देखते हुए डच गवर्नर मुस्ताफ विलेम वैन इम्होफ जनवरी 1739 में कोच्चि का दौरा किया।
अपनी जुलाई की रिपोर्ट में उन्होंने माला बार के डच उपनिवेश को बचाने के लिए सैन्य कार्यवाही करने की सिफारिश की। कूटनीति का सहारा लेते हुए वैन इम्होक ने सबसे पहले त्रावणकोर को पड़ोसी राज्यों कोलम कोच्चि और कायमकुलम से सैन्य गठबंधन किए उसके बाद त्रावणकोर के राजा से शांति वार्ता के लिए बातचीत कि। इस बैठक दौरान त्रावणकोर के राजा को शर्तें न मानने पर युद्ध की धमकी दी गई।
बात का जवाब देते हुए त्रावणकोर के राजा ने कहा की अगर वे इस युद्ध में हार भी गए तब भी एक दिन वे मछली पकड़ने वाली नाव लेकर नीदरलैंड और यूरोप पर हमला करके उन्हें हरा देंगे। अंत में अपसी बहस के चलते वार्ता को उचित परिणाम नहीं निकल पाया।
युद्ध की घोषणा
1739 में डच ईस्ट इण्डिया कंपनी ने श्री लंका से डचों के कैप्टन जोहान्स हैकर्ट की कमान में सेना भेज कर त्रावणकोर पर हमला कर दिया। अतः अचानक हुए हमले से संभल ना पाने कारण त्रावणकोर की सेना को पीछे हटना पड़ा और कोल्लम में डच सेना का अधिकार स्थापित हो गया। इस प्रकार डच सेना ने कई युद्धों में विजय हासिल की दक्षिण के आर्कोट पर अधिकार करने के बाद डच सेना अटिंगल की तरफ बढ़ी। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी त्रावणकोर की दयनीय स्थिति का लाभ उठाना चाहती थी मगर सैन्य बल कम पड़ रहा था।
दूसरी तरफ ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी भी त्रावणकोर के राजा की बढ़ती शक्तियों के कारण परेशान थी सो इन्होंने भी डच सेना की सहायता के लिए अपने 150 संख्या की सैन्य टुकड़ी को भेजा मगर अभी भी सैनिक कम पड़ रहे थे। डच ईस्ट इण्डिया कंपनी ने इंडोनेशिया से मदद मांगी मगर इस समय काल के दौरान इंडोनेशिया में ग्रह युद्ध चल रहा था जिसके कारण वे सैनिक भेजने में असफल रहे। लेकिन डच कंपनी श्री लंका जिसे पहले सीलोन के नाम से जाना जाता था से सैनिक मंगाने में सफल रहे।
कोलाचेल का युद्ध
सभी सैनिकों को बुलाने के बाद डच सेना ने 26 नवंबर 1740 कोलाचेल पर नौसैनिक बेड़ा भेजा और शहर पर बमबारी करके उसे खाली करने पर मजबूर कर दिया। डचों की योजना कोलाचेला पर अधिकार स्थापित करने की थी जिसके माध्य से पद्मानाभपुरम पर कब्जा कर पाना आसान हो जाता। 29 नवंबर को डच कमांडर वैन गोलिनेसे ने कोलाचेल के आसपास त्रावणकोर तट की पूर्ण नाकाबंदी की घोषणा की और अपनी सेनाओं को तट की और जाने वाले सभी जहाजों को जब्त करने का निर्देश दिया सिवाय उन जहाजों के जो एडवा से माल ले जा रहे थे।
13 जनवरी 1741 को डच जहाज मारसेवीन को दक्षिण की ओर भेज दिया गया जिसे थेनगापट्टनम और कोलाचेल क बीच लंगर डालना था। 10 फरवरी को सात बड़े जहाज़ और कई छोटे पोतों वाले एक अन्य डच अभियान दल ने कोलाचेल के ठीक उत्तर के तट पर कदम रखा।
कोलाचेल बंदरगाह में प्रवेश करने वाली डच ईस्ट इंडिया कंपनी को हराने में मराकायरों ने प्रमुख भूमिका निभाई नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय के डी लैनाय के शोधो से पता चला है कि मराकायार समुदाय और उनके लोगों के लोगों ने डच जहाजों को हराने में और डच सैनिकों को बंधक बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और त्रावणकोर के राजा की मदद की थी।
परिणास्वरुप डच सैनिक कौलाचेल पर अपना अधिकार जमाने में सफल रहे और इसके बाद डचों ने अगल बगल के क्षेत्रों पर कब्जा जमाना प्रारंभ किया। जब मार्तंड वर्मा को इसकी सूचना मिली तब पद्मानाभपुरम से मार्तंड वर्मा ने 2000 सैनिकों को कोलाचेल भेजा और कोलाचेल को वापिस पाने के लिए रणनीति बनाई। मार्तंड वर्मा ने समुद्र से किसी भी प्रकार कि आपूर्ति को रोकने के लिए मछली पकडने वाली नौकाओं का इस्तेमाल किया इस प्रकार मार्तंड वर्मा ने डच सैनिकं सहित पूरे कोलाचल को घेर लिया।
संख्या में अधिक होने के बावजूद यूरोपीय लोग तकनीकी रुप से श्रेष्ठ थे जिसके बल पर डच सैनिकों न त्रावणकोर की सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। इसी बीच बारिश और बाढ़ जैसी स्थितियों के कारण डच सेना को आपूर्ति प्रवाह पूरी तरह से बाधित हो गया और बारूद के गिला होने का कारण कमजोर पड़ गये।
परिणामस्वरूप 5 अगस्त 1941 में त्रावणकोर की तरफ से दागा गया गोला जा कर डच चौंकी के अंदर बरुद से भरे बैरल से टकराया जिस के चलते गोला बारूद के भंडार के साथ ही खाद्य भंडार भी उड़ गया। गोला-बारूद और भोजन की कमी के कारण डचों को मजबूर होकर आत्मसमर्पण करना पड़ा। यह तिथि इतिहासकारों के अनुसार 10 अगस्त 1741 की थी।
कोलचेल की लड़ाई का प्रभाव
इस युद्ध के चलते डच ईस्ट इण्डिया कंपनी का केरल से व्यापार समाप्त हो गया। इस युद्ध का खास यह प्रभाव निकला की डच कैदियों ने मार्तंड वर्मा का साथ दिया और उन्होंने यूरोपीय तर्ज पर त्रावणकोर सेना का आधुनिकरण किया। जिसके चलते नव प्रशिक्षित त्रावणकोर की सेना अन्य राज्यों के विरुद्ध मार्तंड वर्मा के लिए अत्यंत प्रभावी साबित हुई। इसके साथ ही डच कैदियों के सहयोग से बने त्रावणकोर के किले को इतना मजबूत बना दिया की इसने 1791 में फ्रांसीसी हथियारों से लैस मैसूर सेना के आक्रमण को रोक दिया। किले के निर्माण का मुख्य श्रेय डी लैनांय नामक व्यक्ति को जाता है।
इस घटना के चलते त्रावणकोर साम्राज्य ने डचों के मिर्च व्यापार पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। देश के आजाद होने के बाद भारत सरकार ने डच सेना के विरुद्ध मिली इस जीत में कुलाचेल में विजय स्तंभ की निर्माण करवाया। भारतीय डाक विभाग ने मद्रास रेजिमेंट की 9वीं बटालियन की स्थापना की। इस घटना की 300वीं वर्ष गांठ पर यानी 1 अप्रैल 2004 को 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया। इसके साथ ही पांगोडे सैन्य शिविर के परेड ग्रांउड को कुलाचल ग्राउंड का नाम दिया गया।

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