प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में टेलीकिनेसिस के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही इस तकनीक पर हुई रिसर्च के परिणाम तथा वास्तविकता में क्या यह संभव इस पर बात करेंगे। खास बात यह है कि अमेरिका और रुस जैसे देश इस पर पहले ही रिसर्च कर चूकें है। इसके साथ ही हम कुछ ऐसे उदाहरण पेश करेंगे कि जिससे यह साबित होता है कि यह अस्तित्व में तो है मगर आम इंसान का इसे प्रयोग कर मुश्किल है।
परिचय
टेलीकिनेसिस शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ है। दूर से किसी वस्तु में गति करवाना। यानी किसी निर्जीव वस्तु को अपने मन की शक्ति से उठाना मोड़ना य फिर तोड़ देना। अकसर फिल्मों में ऐसा होते हुए देखा गया है जिसमें व्यक्ति किसी औब्जेक्ट को बिना छूए ही उसे हिला सकता है। भारतीय इतिहास की दंत कथाओं में भी इसका जिक्र मिलता है। भारतीय योग शास्त्र में इसे ध्यान और समाधि की अवस्था में मिलने वाली अष्ट सिद्धियों से जोड़ा जाता है। इस तकनीक पर की गई रिसर्च की बात करें तो अमेरिका की CIA एजेंसी ने इस पर रिसर्च की जिसे इन्होंने Stargate project का नाम दिया था।
स्टारगेट प्रोजेक्ट
1970 से 1990 दशक के दौरान अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और अमेरिकी सेना ने इस प्रोजेक्ट को मिलकर अंजाम दिया था। इस प्रोजेक्ट पर लगभग 20 मिलियन डालर खर्च किए गए थे। सेना का लक्ष्य था कि अगर इस प्रोजेक्ट में सफलता मिलती है तो सेना इसका प्रयोग जासूसी और युद्ध में विरोधी सेना के हथियारों के निष्क्रिय करने के लिए जा सकता है। मगर दुख की बात यह रही की प्रोजेक्ट में सफलता नहीं मिली। 1995 में इस प्रोजेक्ट को पुरी तरह से बंद कर दिया गया।
जे बी राइन की रिपोर्ट
ये ड्यूक यूनिवर्सिटी में एक प्रोफेसर थे जिन्हें पैससाइकोलाजी का जनक भी कहा जाता है उन्होंने अपने प्रयोग में पाया मन से पासे के गिराने से नंबर प्रभावित होते है। शुरूआत में इनकी रिसर्च में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले मगर जब अन्य वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग को कड़े नियमों से साथ दुबारा प्रयोग किया तो परिणाम निराशा जनक निकले।
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की पैयर लैब
1979 से 2007 तक यूनिवर्सिटी ने इस पर लगभग 28 सालों तक रिसर्च की मगर परिणाम अभी भी निराशाजनक ही थे।
उपरोक्त सभी रिपोर्ट से यह साबित होता था कि बिना छूए किसी ओब्जेक्ट को हिला पाना मुमकिन नहीं है विज्ञान के मुताबिक टेलीकिनोसिस भौतिकी के स्थापित नियमों जैसे उष्मा गति की और संवेग संरक्षण का सीधे तौर पर विरोध करता है। वहीं न्यूरोसाइंस के अनुसार हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली विद्युत तरंगें इतनी कमजोर होती है कि वे खोपड़ी के बाहर जाकर किसी भी ठोस वस्तु पर बल नहीं लगा सकती। ये आज से कई वर्ष पहले कि रिपोर्ट थी। मगर वर्तमान समय में न्यूरोसाइंस ने ही इस तकनीक को पहले सही साबित करके दिखाया है।
वैसे दोस्तों हमारा मानना यह है की विज्ञान किसी चीज़ को तब तक सही नहीं मानता जब की उसे साबित करने के ठोस प्रमाण न हो। लेकिन इस बात का यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि विज्ञान जिसे न माने वे हो नहीं सकता। एक समय था जब हवाई जहाज़ की खोज नहीं हुई थी। तब इस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों को मूर्ख ही समझा जाता रहा होगा मगर वर्तमान समय को देखे तो परिणाम हमारे सामने है।
ब्रेन कम्पयूटर इंटरफेस BCI
दोस्तों भले ही टेलीकिनेसिस रहस्यमय या जादुई साबित हुआ हो मगर न्यूरोसाइंस ने इस तकनीक को साबित करके के दिखाया है। इस तकनीक में इंसान के सर पर सेंसर लगाए जाते हैं जो मस्तिष्क से सिगनल को पढ़ते है फिर इन सिगनल को ब्लूटूथ या कंप्यूटर के जरिये मशीनों तक भेजा जाता है। इस तरह से एक लकवा ग्रस्त इंसान भी सोच समझ कर कंप्यूटर का कर्सर हिला सकता है।
उदाहरण के लिए आप मशहूर और जाने माने वैज्ञानिक Stephen Hawking को तो जानते ही होंगे। 22 साल की उम्र से ही उन्होंने एक लकवा ग्रस्त शरीर होने के नाते कुर्सी पर ही अपनी सारी रिसर्च अपने दिमाग से भेजे सिग्नल से ही की थी। हां मगर यह उनके समय में भी अधूरा था मगर वर्तमान समय में कृत्रिम बौद्धिक क्षमता से यह कर पाना लगभग मुमकिन है।
सवाल फिर वही है दूर से किसी ओब्जेक्ट को कैसे उठाया जा सकता है।
सोवियत यूनियन की रिपोर्ट
शीत युद्ध के दौरान रुस की रहनी वाली Nina Kulagina नामक महिला ने कड़े प्रयोगशाला परीक्षण किए वे दावा करती थीं कि वे अपनी दिमागी शक्ति से चीजों के हिला सकती हैं। हलांकि बाद में कई वैज्ञानिकों और जादूगरों ने इसे हाथ की सफाई और छिपे हुए धागों का खेल कहा।
लेकिन हमारा मानना है कि यह संभव हो सकता है। बस हमें उस फ्रिवेंसी को खोजने की जरूरत है जिस पर यह काम करता है। लगभग-लगभग हर वैज्ञानिक को अपने शुरुआती प्रयोग में सफलता मिली थी भले ही बाद में उनके प्रयोगों का प्रमाणीकरण नहीं मिल पाया है। उदाहरण के लिए एक ब्लूटूथ डिवाइस को ही लेते है य अपने मोबाइल का नेटवर्क ही ले सकते है। ये किसी खास प्रक्वेंसी पर हमारे फोन में नेटवर्क प्रदान करती है जिससे हमारे दैनिक कार्य आसान हो जाते है।
हो सकता है दोस्तों जिस तरह से हाइब्रेड सब्जियों को बनाया गया उसी प्रकार इंसानों पर रिसर्च करके भविष्य में हमारे लिए यह संभव हो सके। लेकिन मज़ा तो तभी आयेगा जब एक आम इंसान टेलीकिनेसिस तकनीक को खुद से काबू कर सके या इसका उपयोग कर सके। वैसे आपकी इसके बारे में क्या राय है हमें जरूर लिखें।

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