प्रस्तावना
प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है।
इतिहास
13वीं सदी के समय काल में राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।
खादीन तकनीक
वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।
वास्तुकला का अच्छा ज्ञान
कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।
पलायान का मुख्य कारण
19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।
कहानी का दुसरा पहलू
बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।
श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति
पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।
आधुनिक रिसर्च के प्रमाण
ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।
2017 की भूकंप थ्योरी
2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।
डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच
आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।
हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है।

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