Indian History reveal the Past

हमारे इस ब्लॉग में भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक इतिहास, राजवंशों आंदोलन स्टार्टअप टेक्नोलॉजी कला और वास्तुकला तथा आर्थिक इतिहास से संबंधित विषयों पर जानकारी दी जाती है। हम कम से कम शब्दों में ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं।

लेबल

2026-10-17

बृहदेश्वर मंदिर

 
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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में चोल साम्राज्य द्वारा बनाये गए बृहदेश्वर मंदिर बारे में बात करने जा रहे है। इस मंदिर के बारे में जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यह यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया है। मंदिर के निर्माण चोल साम्राज्य की स्थापत्य कला शैली का प्रयोग किया गया है। यह मंदिर हिन्दू देवता भगवान शिव को समर्पित है जिसके चारों तरफ खाई का निर्माण किया गया था।

परिचय

तमिलनाडू का बृहदेश्वर मंदिर चेन्नई से लगभग 350 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित तंजावुर शहर में है। जहां जाने के लिए आप यातायात के विभिन्न साधनों का इस्तेमाल कर सकते है। यहां रेलवे मार्ग से जा सकते है इसके साथ ही हवाई मार्ग के लिए आपकों तिरुचिरापल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के माध्य से भी जा सकते है जो कि तंजावुर शहर से सिर्फ 55 किलोमीटर दूर है। इसके साथ राष्ट्रीय राजमार्ग 67 45 और 226 के माध्यम से भी आप यहां आसानी से पहुंच सकते है।

इतिहास

इस मंदिर को 1003 से 1010 ईसा पूर्व के समय काल में चोल साम्राज्य के शासक एवं सम्राट राजराज प्रथम ने बनवाया था। 5वीं से 9वीं शताब्दी के समय काल में इस क्षेत्र विशेष में चालुक्य साम्राज्य शासन था तब से ही यहां मंदिर निर्माण की नवीनतम कला शैलियों का विकास होने लगा था।

जिनमें ऐहोल बादामी तथा पट्टाडकल कला शैलियां बहुत प्रचलित थीं जिनके उदाहरण चालुक्य साम्राज्य के पतन के बाद पल्लव साम्राज्य के शासन काल में भी देखने को मिलता है। इसके बाद चोल साम्राज्य के उदय में इन शैलियों का और अधिक विकास हुआ। प्रारम्भ में चोल साम्राज्य ने भी भूमि विस्तार तथा अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने पर अधिक जोर दिया और वास्तुकला पर कम।

दसवीं शताब्दी में जा कर चोल साम्राज्य में भी बहुआयामी वास्तुकला शैलियों का विकास होना प्रारम्भ हुआ। जिसका मुख्य उदाहरण यह मंदिर है। इसके साथ ही मंदिर के स्तंभ निर्माण में विभिन्न प्रकार की विशेषताओं का विकास भी हुआ। जिसमें से शीर्ष पर उभरे हुए गोलाकार स्तंभ प्रमुख है।

जार्ज मिशेल के आनूसार- यह एक नई चोल शैली के विकास की शुरुआत थी जो कि बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में मुख्य रुप से प्रयोग की गई थी। मुख्य रुप से मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी से आरम्भ हुआ। जिसके बाद अगले 1000 वर्षों तक मंदिर में कई निर्माण कार्य किए गए जिनमें मंदिर का जीर्णोद्धार और मंदिर का मरम्मत कार्य भी शामिल है।

दरअसल मदुरै पर शासन करने वाले मुस्लिम शासकों और तंजावुर पर शासन करने वाले हिंदू राजाओं के आपसी संघर्ष और आक्रमण के कारण मंदिर को कई बार क्षति पहुंचाई गई। अतः हिंदू राजाओं द्वारा नियंत्रण पुनः प्राप्त करने के बाद मंदिर का पुनः निर्माण करवाया जाता।

कुछ मामलों में पुराने कलाकृति व भित्ति चित्र को दुबारा से बनवाया गया क्योंकि पुराने वाले चित्र धुंधले पड़ गये थे। इसी प्रकार कुछ अन्य मामलों में नए मंदिर बनवाने का प्रयोजन भी किया गया। उदाहरण के लिए कार्तिकेय जिन्हें मुरुगन कहा जाता है तथा पार्वती देवी जीन्हे अम्मन कहा जाता और नंदी के महत्वपूर्ण मंदिरों का निर्माण 16वी से 17वीं शताब्दी में हुआ।

इसी प्रकार दक्षिणा मूर्ति का निर्माण मराठों द्वारा किया गया। जिनका उन्होंने अच्छे से रखरखाव भी किया।


मंदिर परिसर 

इस मंदिर को निर्माण में गणित की ज्यामिति नियमों का प्रयोग किया गया है। इस मंदिर का निर्माण मानव निर्मित ऊंचे टीलों पर किया गया है। मंदिर  परिसर एक आयत है जो दो वर्गााकारों के आकृति में बना है। यह पूर्व से पश्चिम तक 240.79 मीटर तक तथा उत्तर से दक्षिण तक 121.92 मीटर तक फैला हुआ है। मंदिर को मुख्यतः पांच भागों में विभाजित किया गया है।

पहला विशाल गर्भगृह जिसे श्री विमान कहा जाता है दुसरा सामने का नंदी मंडप इसके बाद इनके बीच मुख्य सामुदायिक हाल जिसे मुखमंडपम भी कहा जाता है। इसके बाद महामंडपन और गर्भ गृह को महामंडपम से जोड़ने वाला मंडप है जिसे अंतराल भी कहा जाता है।

मंदिर परिसर में एक विशाल प्रांगण है जो कि बड़े स्तंभों पर टिका है जिसकी परिक्रमा करने के लिए लगभग 450 मीटर की परिधि है। इस स्तंभों वाले बरामदे के बाहर दो चारदीवारी हैं। जिसमें बाहरी दीवार रक्षात्मक है जिसे फ्रांसीसी औपनिवेशिक सेनाओं द्वारा बनवाई गई थी।

इसमें तोपों के संचालन के लिए छेद है जिनका प्रयोग मंदिर की सुरक्षा के लिए किया जाता था। उन्होंने बाहरी दीवार को ऊंचा बनाया जिससे मंदिर परिसर का क्षेत्र अलग-अलग हो गया। इसके पूर्वी छोर पर मूल मुख्य गोपुरम जिसे हम मुख्य द्वार के नाम से भी जाना जाता वह है जो कि मेहराबदार है।

मंदिर का गर्भ

मुख्य मंदिर के विमान यानी गर्भ ग्रह के ऊपर का हिस्सा गोलाकार गुंबद नूमा बनाया गया। 11वीं शताब्दी के बाद मूल मंदिर में अतिरिक्त संरचनाएं जोड़ी गई जैसे कि उत्तर-पूर्व कोने का मंडप और परिधि पर अतिरिक्त प्रवेश द्वार ताकि लोग कई स्थानों से प्रवेश और निकास कर सके।

मंदिर की संरचनाएं मुख्य रुप से पांड्य नायक विजयनगर और मराठा काल के दौरान तथा औपनिवेशिक युग शुरु होने से पहले जोड़ी गईं और खास बात यह है कि इन  निर्माताओं ने मंदिर की मूल योजनाओं और समरूपता के नियमों का सम्मान किया।

मूल मंदिर के प्रांगण के भीतर मुख्य गर्भगृह और नंदी मंडपम के साथ दो प्रमुख मंदिर भी है जैसे एक कार्तिकेय के लिए दूसरा मां पार्वती को समर्पित है। इनके अलावा परिसर में अतिरिक्त छोटे मंदिर भी हैं। बृहददेश्वर मंदिर ने स्थापत्य कला और सजावटी तत्वों को अपनाकर दक्षिण भारत की हिंदू मंदिर परंपराओं को जारी रखा।

लेकिन इसका पैमाना 11वीं शताब्दी से पहले निर्मित मंदिरों से कहीं अधिक था। चोल युग के वास्तुकारों और कारीगरों ने विशेष रुप से भारी पत्थर के साथ निर्माण करने और 63.4 मीटर ऊंचे विशाल विमान को पूरा करने के लिए विशेषज्ञता में प्रतिभा शाली विकास किया था।

राजराजा प्रथम और उनके गुरु का चित्र


नंदी मंदिर के नायक काल की छत पर बनी चित्र राजा के भित्ती चित्र बनाये गए है। इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह की दीवारों पर परिक्रमा मार्ग के साथ-साथ चोल राजा के चित्रों को एक निचली परत पर कुरेदा गया है। फर्श से छत तक फैले इन भित्ति चित्रों की खोज 1931 में अन्नामलाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस के गोविंदासामी जी ने की थी।

चित्रकारों ने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया और उन्हें गीले चुना पत्थर की परत में तब मिलाया जब वह जम रही थी। चोल भित्तिचित्र मुख्य रुप से शैव धर्म के संबंधित थे। इनका जीर्णोद्धार 2000 के दशक में किया गया था।

चोल भित्ति चित्रों का कुल क्षेत्रफल लगभग 670 वर्ग मीटर है जिसमें से लगभग 112 वर्ग मीटर के चित्रों को 2010 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विकास की खोज के माध्यम से उजागर किया गया। ये भित्तिचित्र हिंदू पौराणिक कथाओं का वर्णन करते हैं।

पुरातत्व वैज्ञानिक बाला सुब्रमण्यम के अनुसार अधिकांश भित्तिचित्र शिव से संबंधित हैं। लेकिन 11वीं शताब्दी के चोल भित्तिचित्रों में विष्णु दुर्गा और अन्य साथ ही चोल राजघराने दरबारी और आम जीवन के दृश्य भी दिखाए गए हैं।

नंदी मंडप की छत पर बने भित्तिचित्र

मंदिर में बाद में किए गए निर्माण परिवर्धन और संशोधनों ने मंदिर  के अंदर प्राकृतिक प्रकाश की मात्रा को कम कर दिया है। इस प्रकार भित्तिचित्रों की सीमित रुप से ही तस्वीरें ली गई और उनकी व्याख्या की गई। श्री रामन के अनुसार बेहतर फोटो ग्राफिक उपकरणों के साथ पूर्ण इमेजिंग से पता चलता है कि ये ऐतिहासिक व्याख्याएं गलत थीं।

उदाहरण के लिए एक भित्तिचित्र जिसे पहले दक्षिणामूर्ति शिव के रुप में व्याख्यायित किया गया था। वास्तव में वह एक शाही गुरु का बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए एक धर्मनिरपेक्ष दृश्य है। पेड़ पर मोर पक्षी बंदर गिलहरी और उल्लू साथ ही एक कोबरा को दिखाया गया है।

इसके साथ ही जानवरों और पक्षियों को कोबरा से चिंतित होते हुए दिखाया गया है। पैनल के अन्य भाग भी इसी तरह एक संत को सुनते हुए दरबार को दिखाते हैं। अन्य में विभिन्न वेशभूषा में महिलाएं विभिन्न नृत्य मुद्राओं में दिखाई गईं हैं। गर्भ और गलियारे की दीवारों पर बनी कुछ चित्रकारी एक समय में उन पर जमी कालिख के कारण क्षतिग्रत हो गई थी। 

सदियों से गर्भगृह में दीपों से निकलने वाले धूनएँ और  कपूर के जलने से निकलने वाली कालिख के निरंतर संपर्क में रहने के कारण परिक्रमा मार्ग की दीवारों पर बने चोल चित्रकारी के कुछ हिस्से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने विश्व में पहली बार अपनी अनूठी प्लास्टर हटाने की प्रक्रिया का  उपयोग करके 1000 वर्ष पुराने चोल भित्तिचित्रों पर आरोपित 16नायक चित्रों का जीर्णोद्धार किया है।

इन 400 वर्ष पुराने चित्रों को फाइबर ग्लास बोर्ड पर लगाया गया है और एक अलग मंडप में प्रदर्शित किया गया है।

शिलालेख

इस मंदिर में 11वीं शताब्दी के तमिल और संस्कृत शिलालेख मौजूद है। मंदिर की दीवारों पर तमिल और ग्रंथा लिपियों में अनेक शिलालेख हैं। इनमें से कई शिलालेख राजा के बारे में पारंपरिक संस्कृत और तमिल भाषा में ऐतिहासिक परिचय से शुरु होते है। 

मंदिर परिसर में राजाराज चोल प्रथम के चौंसठ शिलालेख तथा 2 राजेंद्र चोल प्रथम के उनतीस शिलालेख विक्रमा चोल कुलुत्तुंगा  प्रथम और राजामहेंद्र जिन्हें राजेंद्र द्वितीय के नाम से भी जाना जाता है के एक-एक शिलालेख तथा एक संभावित पांड्य राजा के तीन शिलालेख और नायक शासकों अच्युतप्पा नायक और मल्लापा नायक के दो शिलालेख है।

परिसर की उत्तरी दीवार पर 1011 ईस्वी का एक शिलालेख मंदिर द्वारा आयोजित और समर्थित लोगों का विस्तृत विवरण देता है। शिलालेख में उनके वेतन भूमिकाओं और उनके नाम का विवरण दिया गया है।

इसमें 600 से अधिक नाम शामिल है जिनमें मुख्य रुप से पुजारी दीपक जलाने वाले धोबी दर्जी जौहरी कुम्हार बढ़ई पवित्र छत्रवाहक नृत्य गुरु नर्तकियां गायक पुरुष और महिला संगीतकार प्रदर्शन कलाकारों के अधीक्षक लेखाकार आदी शामिल है।

इसके साथ ही उनके वेतन भूमि के टुकड़ों के रुप में था इसलिए मंदिर में उनका रोजगार संभवतः अंशकालिक था। मंदिर में देव दासियां कार्यरत थीं जो नृत्यांगनाएं और भक्ति गीत गातीं थी। मंदिर  के अनेक शिलालेखों में अक्सर ऐसे दान का उल्लेख मिलता है जिनमें लिखा है पूजा अर्चना संन्यासियों की सभा के लिए भोजन और सेवा करना था।

जार्ज मिशेल के अनुसार तंजावुर मंदिर अपने इतिहास में एक प्रमुख धर्मार्थ संस्था थी। यहां प्रतिदिन तीर्थ यात्रियों भक्त और राहगीरों को निशुल्क भोजन प्रदान किया जाता था। हिंदू त्योहारों के दिनों में ये भोजन भव्य होते थे और विशेष रुप से ब्राह्मणों को आमंत्रित करके भोजन कराया जाता था।

भारत सरकार द्वारा किए गए कार्य

भारत सरकार द्वारा 26 सितंबर 2010 में बिग टेंपल से शताब्दी समारोह के पांचवे दिन को देश के सांस्कृतिक स्थापत्य और शिलालेख इस मंदिर के इतिहास को बिग टेंपल को योगदान को रुप में मान्यता देते हुए।

इंडिया पोस्ट द्वारा 216 फीट ऊंची विशाल राजा गोपुरम की प्रतिमा के चित्र को दर्शाने वाले 5 रुपये के डाक टिकट को जारी किया गया था। जिसका आदेश संचार और सूचना प्रौद्योगिकी के कैबिनेट मंत्री ए राजा ने दिया था। भारतीय रिज़र्व बैंक ने मंदिर की आकृति को उभार कर 5 रुपये का सिक्का जारी करके इस घटना को यादगार बनाया।

वर्तमान समय में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मंदिर के जीर्णोद्धार और दीर्घकालिक संरक्षण का जिम्मा लिया है। इसके साथ ही मंदिर ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स की श्रेणी में शामिल किया गया है।

वर्ष 1954 में भारतीय रिज़र्व बैंक ने 1000 को पुराने नोटों के पिछले हिस्से पर बृहदेश्वर मंदिर का चित्र छापा था। जिसे बाद में 1978 में बंद कर दिया गया था।

निष्कर्ष

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर केवल चोल साम्राज्य की वैभवशाली शक्ति और राजा राजराज चोल प्रथम की अगाध भक्ति का प्रतीक नहीं है बल्कि यह भारतीय वास्तुकला इंजीनियरिंग और कला का एक अनुपम उदाहरण भी है। 1000 वर्षों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह महान जीवित मंदिर अपनी भव्यता के साथ सीना ताने खड़ा है।

इसके अभूतपूर्व योगदान और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने भी इसे उचित सम्मन दिया है चाहे वह इसके 1000 वर्ष पूरे होने पर जारी किया गया 1000 रुपये का विशेष नोट हो य 5 रुपये का डाक टिकट हो। इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इसका निरंतर संरक्षण किया जा रहा है।

इसके साथ ही भारत सरकार ने इस मंदिर को यूनेस्कों की विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई थी। अतः यह हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम इस महान ऐतिहासिक विरासत को संजोकर रखें और अपनी आने वाली पीढ़ियों को इसके गौरवशाली इतिहास से परिचित कराते रहें।

2026-10-15

नालन्दा विश्वविद्यालय

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम नालन्दा विश्वविद्यालय के इतिहास के बारे में बात करने जा रहें है एक समय ऐसा था जब देश विदेश के लोग यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। यहां खगोल शास्त्र गणित तथा दर्शनशास्त्र आदि जैसे वैज्ञानिक विषयों को पढ़ाया जाता था। खास बात यह है कि इसी भारतीय विश्वविद्यालय में शून्य की खोज की गई थी।

इसके साथ ही यहां पाई का मान तथा चिकित्सा विज्ञान की ऐसी तकनीकों की खोज उस समय के काल में ही कर ली गयी थी जो आज के वैज्ञानिक खोजने में ही वर्षों का समय लगा देते है। यहां के प्रसिद्ध शिक्षक नागार्जुन जी ने माध्यमिक सूत्र नाम का एक ग्रंथ लिखा था जिसमें उन्होंने थ्योरी आप रिलेचीविटी का सिद्धांत दिया था।

जिसे हम वर्तमान समय में आईंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटीविटी के नाम से जानते है। हलांकि प्राचीन काल में इसका नाम कुछ ओर ही था मगर वर्तमान समय में हम इस आईंस्टीन की थ्योरी के नाम से ही जानते है।

इतिहास

इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त राजवंश के राजा कुमार गुप्त द्वारा की गई थी। हलांकि एक तरह से देखा जाये तो इसकी स्थापना का मुख्य श्रेय उनके पिता चंद्रगुप्त को जाता है जिन्हें हम विक्रमादित्य के नाम से भी जानते है।

क्योंकि उन्होंने ही अपने साम्राज्य को इतना समृद्ध बनाया की राजा कुमार गुप्त को उस समय काल की प्रसिद्ध आक्रमण नीति से दूर हटके तथा किसी बाहरी शासक के आक्रमण के भय को दूर करने में अहम भूमिका निभाई।

महाराज विक्रमादित्य के दरबार में नौ रत्न थे जो कि अपने अलग-अलग विषयों में महारत हासिल किए हुए थे। प्रथम कालिदास जो कि संस्कृत के महाकवि और नाटककार थे। द्वितीय धनवंतरि जो कि आयुर्वेद के महान आचार्य और चिकित्सक थे। इन्हें शल्य चिकित्सा और औषधीय विज्ञान का ज्ञाता माना जाता था।

तृतीया क्षपणक थे ज्योतिष शास्त्र और बौद्ध दर्शन के ज्ञाता थे। चौथे शंकु थे जिन्हें एक महान वास्तुकार और शिल्पकार गणितज्ञ माना जाता था। पांचवें अमर सिंह थे इन्हें महान संस्कृत का ज्ञाता और व्याकरण शास्त्री माना जाता थ। इन्होंने ही संस्कृत शब्दकोश अमरकोश की रचना की थी।

छठवें बेताल भट्ट वे जादू तंत्र-मंत्र और नीति शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे सातवें घटकर्पर वे संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता और शिल्प और कविता के ज्ञाता थे। आठवें वराहमिहिर थे वे प्राचीन भारत के महान खगोल शास्त्री और गणितज्ञ थे। इनकी प्रमुख रचना पन्चसिद्धान्तिका तथा बृहत्संहिता आदी थीं।

अंतिम वररुचि जी थे जिन्हें हम व्याकरण और प्राकृत भाषाओं के आचार्य के रुप में जानते हैं। इन्होंने पाणिनि की व्याकरण पर की टीकाएं लिखी थी।

महाराज कुमार गुप्त

415 ईस्वी में जब महाराज कुमार गुप्त ने मगध की गद्दी को सम्भाला तो उन्हें एक ऐसा साम्राज्य मिला जहां न तो पैसों की कमी थी और न ही दुश्मनों का डर चारों तरफ सुख और शांति का माहौल था। ऐसे में राजा कुमारगुप्त के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि साम्राज्य को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कैसे किया जाए।

उनकी इसी सोच ने दुनिया के सबसे बड़े विश्व विद्यालय के निर्माण की योजना को जन्म दिया। इस प्रकार 427 ईस्वी के लगभग इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया।

आचार्य नागार्जुन

भले ही महाराज कुमार गुप्त ने इसका निर्माण प्रारम्भ करवाया मगर इस मिट्टी में ज्ञान का बीच सदियों पहले आचार्य नागार्जुन द्वारा ही बोया गया था। वे बौद्ध धर्म के महान दार्शनिक और चिकित्सक थे जो कि कुमार गुप्त के शासन काल से 200 वर्ष पहले के थे। उन्होंने रस चिकित्सा की खोज की तथा धातुओं की भस्म बनाने की विधि से चिकित्सा करने की खोज की।

इसके साथ ही उन्होंने माध्यमिक सूत्र नाम एक ग्रंथ की रचना की जिसमें उन्होंने शून्य का सिद्धांत दिया। जो की वर्तमान समय में आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी से मिलता जुलता है। नागार्जुन और उनके शिष्यों ने राजगृह के जंगलों में छोटे-छोटे आश्रम बना रखे थे जहां देश-विदेश के छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे।

जब कुमारगुप्त राजा बने तो उन्होंने देखा कि ज्ञान का यह समंदर छोटे-छोटे और अलग-अलग आश्रमों में बिखरा हुआ है। उन्होंने सोचा की तलवार के दम पर बनाए गए साम्राज्य की एक समय सीमा होती है मगर भारत को हमेशा के लिए विश्व गुरु बनाने के लिए हमें जमीन के बदले इंसनी दिमाग को जीतना होगा और ज्ञान की शक्ति पर भरोसा करना होगा।

कुमार गुप्त की रणनीति

राजा कुमार गुप्त स्वयं के पक्के सनातनी थे और भगवान कार्तिकेय के उपासक थे लेकिन वे ज्ञान का सम्मान करते थे। उनका उद्देश्य एक ऐसा महाविहार य विद्यालय खड़ा करने का था जहां विदेशी छात्र तथा जनता सेना देखकर नहीं बल्कि भारतीय आचार्यों का दिमाग देख कर दंग रह जाएं।

इसके लिए उन्होंने राजगीर के पास एक पवित्र जमीन को चुना जहां पहले आमों का बगीचा हुआ करता था यह वही स्थान है जहां पर आचार्य नागार्जून के शिष्यों के आश्रम थे। इस स्थान के इतिहास के बारे में बताया जाता है की प्राचीन व्यापारियों ने यह स्थान खरीद कर भगवान बुद्ध को अर्पित किया था।

विश्वविद्यालय को हमेशा के लिए आत्मनिर्भर बनाने के लिए कुमार गुप्त ने एक योजना बनाई अतः इसके परिणामस्वरूप नालन्दा विश्वविद्यालय के आसपास के 100 सबसे अमीर गांवों की एक सूची तैयार करवाई और इन गांवों के लिए एक कानून पास किया की इन गांवों से मिलने वाला सारा कर अनाज दूध घी और कपड़ा आदि सीधे नालन्दा विश्वविद्यालय के कोश में जाएगा।

इसका सिधा मतलब यह था कि विश्वविद्यालय को अपने खर्च के वहन के लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

निर्माण कार्य की रणनीति

इस प्रकार 427 ई.में नालन्दा विश्वविद्यालय का निर्माण कार्य शुरु हुआ। चारों तरफ पत्थरों की 40 फुट के लगभग की पत्थरों की दीवारों का निर्माण करवाया गया। जिससे एक सुरक्षित किले का निर्माण हो सके इसके साथ ही अंदर आने जाने के लिए सिर्फ मुख्य द्वारा को ही रखा गया। नालन्दा में कुल 8 बड़े हाल परिसर और 300 से ज्यादा  कमरों का निर्माण करवाया गया।

उस समय काल में बिजली की व्यवस्था नहीं थी जिसका ख्याल रखते हुए प्राकृतिक रोशनी को परिसर में पहुंचाने की उचित व्यवस्था की गई इसके साथ ही हवा के आवागमन का भी इमारत के निर्माण में उचित ख्याल रखा गया। छात्रों के कमरों में पत्थर की खाट का निर्माण किया गया ताकि वे ज्यादा दिन चलें और उन्हें सुरक्षा प्रदान करें।

किताबों के शेल्फ

किताबों को रखने के लिए दुर्लभ शेल्फ का निर्माण किया गया था ताकि हाथ से लिखी पोथियां नमी और दीमक लगने से खराब न हो सकें। परिसर में समय देखने के लिए तांबे के कटोरे का इस्तेमाल किया जाता था जिसकी सतह में एक छेद होता था जो की धीरे-धीरे कटोरे के बर्तन को पानी भरता रहता था।

अतः जब कटोरा डूब जाता था तो एक घण्टा पूरा होता था। इस प्रक्रिया को पूरे दिन में 12 बार दोहराया जाता था। कटोरे के भरने पर भिक्षु एक बड़ा नगाड़ा बजाते थे जिससे विषय के बदलने तथा भोजन के समय का पता चलता था।

द्वारपाल की भूमिका

नालन्दा विश्वविद्यालय के द्वारपाल एक ज्ञानी आचार्य होते थे जिन्हें सभी विषयों का अच्छा ज्ञान होता था। वे ही सुनिश्चित करते थे कि किन छात्रों के विश्वविद्यालय में प्रवेश दिया जायेगा और किन को नहीं। वे विश्वविद्यालय पर आये सभी छात्रों का स्वागत करते थे और उनकी बुद्धि की परख करने के लिए उनसे प्रश्न पुछते थे। 

जो उनके सवालों का सही जवाब देता था उसे ही विश्वविद्यालय में प्रवेश की अनुमति मिलती थी। इस प्रकार से लिए प्रवेश के बाद छात्रों का सम्पूर्ण खर्च विश्वविद्यालय वहन करता था छात्रों का एक पैसा भी नहीं लगता था।

परिसर में सिर्फ 10000 छात्रों को ही प्रवेश की अनुमति थी जिन्हें 1500 आचार्यों द्वारा प्रशिक्षित किया जाता था।

आर्यभट्ट का सिद्धांत

476 ईसा  पूर्व के  समय में जब लोग मानते  थे कि पृथ्वी चपटी है और राहु-केतु के प्रकोप से ग्रहण लगता है। तब इसी विद्यालय के गणितज्ञ आर्यभट्ट ने नालन्दा के  वेधशाला में बैठकर तारों की गणना पहले स्वयं सिखा तथा इससे पर शोध किया। शोध के बाद उन्होंने दुनिया को बताया की पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घुमती है और ग्रहण किसी राक्षस के कारण नहीं बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की परछाई के कारण लगता है।

उन्होंने पाई का मान जो कि 3.146 को निकाला तथा शून्य की खोज की। परिणामस्वरूप उनकी इन्हीं सब खोजो ने नालन्दा को दुनिया का सबसे बड़ा साइंटिफिक रिसर्च हब बना दिया था।

ह्वेनसांग का आगमन 

630 ईसा पूर्व ह्वेनसांग जो कि एक चीनी यात्री था भारत आया तो वे नालन्दा परिसर प्रसिद्धि से बहुत हैरान हुआ परिणामस्वरूप उसने विश्वविद्यालय का परीक्षण करना चाहा। वे नालन्दा में कुलपति शीलभद्र का शिष्य बना। लगभग 5 सालों तक उसने योगशास्त्र तथ संस्कृत भाषा को यहां रहकर सिखा। उसने अपनी किताब में नालन्दा की विशाल लाइब्रेरी धर्मगंज का वर्णन किया।

जिसमें वह बताता है कि इसके तीन मुख्य हिस्से थे पहला रत्नासागर जो कि एक तीन मंज़िला इमारत थी जिसमें गणित और  विज्ञान कि किताबें थी। दूसरा रन्तोदधि जहां वेद और पवित्र ग्रंथ आदि रखे जाते थे। तीसरा रत्न रंजक जहां कला और आयुर्वेद के नुस्खों की किताबों का संग्रह रखा जाता था।

नालन्दा के पतन की कहानी

1193 ई.में क्रूर तुर्क शासक एवं कमांडर इख्तियारउद्दीन मोहम्मद बिन बख्तियार खिलजी भारत को लूटने के लिए भारत आया। जब उसने नालन्दा के क्षेत्र बिहार में लूट की घटनाओं को अंजाम देना प्रारम्भ किया तब उसकी तबीयत खराब हो गई जिसके चलते वह एक भयंकर लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो गया। उसके हकीमों द्वारा किए गए सारे इलाज असफल होने पर वह मौत के कगार  पर पहुंच गया।

तब उसके एक दरबारी ने सलाह दी कि वह नालन्दा के आयुर्वेद विभाग के मुख्य आचार्य राहुल श्री भद्र से ठीक हो सकता है। उसके अन्दर इस बात को लेकर हीन भावना ने जन्म लिया कि ऐसा क्या है जिससे उसके खुद के वैद्य अंजान हैं और भारतीय वैद्य उनसे निपुण है। दरअसल वह भारतीयों को नीची नजर से देखता था। अतः परीक्षण के लिए उसने आचार्य राहुल श्री भद्र को बुलाया और उनके आगे शर्त रखी की उसे बिना किसी दवा के ठीक करके के दिखायें।

ऐसा करने न कर पाने उन्हें मौत की सज़ा दी जायेगी श्री भद्र जी ने चुनौती को स्वीकार किया बख्तियार खिलजी का ठीक करने का भरोसा देकर वे अपनी वैद्य शाला में वापिस आ गये। आचार्य ने एक दवा बनाई और उसे कुरान जैसी पाख किताबों के पन्नों पर लगा दिया और दो दिन बाद खिलजी को इस्लाम की पवित्र किताब कुरान देते हुए कहा कि उसे रोज इसके कुछ पन्ने पढ़ने होंगे।

धीरे-धीरे खिलजी ठीक होने लगा क्योंकि कुरान के पन्नों पर लगी औषधि ने अपना काम करना प्रारम्भ कर दिया था। ठीक होने के बाद खिलजी के मन में हीन भावना ने घर कर लिया जिसके चलते आचार्य को इनाम देने की बजाय उसने पूरे नालन्दा को नष्ट करने का निर्णय लिया। क्योंकि भारत को गुलाम बनाने के लिए उनकी रीढ़ की हड्डी नालन्दा विश्वविद्यालय को नष्ट करना आवश्यक था।

खिलजी की आक्रमण

जब खिलजी अपनी सेना लेकर नालन्दा पहुंचा तब उसने देखा कि वहां कोई सैनिक नहीं था सिर्फ निहत्थे बौद्ध भिक्षु और बूढ़े आचार्य थे। खिलजी की सेना ने निहत्थे छात्रों और विद्वानों का बेरहमी से कत्लेआम प्रारम्भ किया। सदियों के शोध को नष्ट करने के लिए उसने नालन्दा की विशाल लाईब्रेरी धर्मगंज में आग लगवा दी। इस पुस्तकालय में 9 लाख से ज्यादा दुर्लभ किताबों का ढेर था जिसके कारण यह पुस्तकालय पूरे तीन महीनों तक जलता रहा।

इस प्रकार भारत का उज्वल भविष्य और हमारा गौरव आग की लपटों में जलकर राख हो गया।


सरकार द्वारा किए गए कार्य

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य के प्राचीन शहर राजगीर में स्थित एक केंद्रीय अनुसंधान विश्वविद्यालय है। सरकार द्वारा राष्ट्रीय महत्व और उत्कृष्टता के संस्थान के रुप में नांलन्दा भारत के विदेश मंत्रालय का एक प्रमुख अंग है। इसकी पुनः स्थापना 2010 में की गई। 

वर्तमान समय में यह स्नातकोत्तर अनुसंधान संस्थान के रुप में कार्य करता है और केवल मास्टर और पीएचडी डिग्री प्रदान करता है। परंपरागत रुप से भारत की ऐतिहासिक विरासत के प्रतीक के रुप में माना जाने वाला नया नालन्दा विश्वविद्यालय राष्ट्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान रुप में काम करता है।

इसका पुनः निर्माण1993.32 करोड़ कि लागत से बना यह विश्वविद्यालय वर्तमान समय में 485 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है। यह भारत के सभी विद्यालयों के परिसरों में से सबसे बड़ा परिसर है। 

वर्तमान समय में यह विश्वविद्यालय 
1.School of Historical Studies यानी SHS
2.School of Ecology and Environment Studies यानी SEES
3.School of Buddhist Studies यानी SBS
4.School of Philosophy and Comparative Religions यानी SPCR
5.School of Languages and Literature and Humanities यानी SLLH
6.School of Management Studies यानी SMS

जैसे विषयों में डिग्री प्रदान करता है इसके साथ ही यहां संस्कृत पाली तिब्बती जापानी और कोरियाई जैसी भाषाओं में डिप्लोमा प्रदान किया जाता है। नालन्दा के नए परिसर का उद्घाटन भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 जून 2024 को किया है।

इसके साथ ही विश्वविद्यालय में तीन विशिष्ट संस्थान है जो धार्मिक समुदाय के विभिन्न संप्रदायों को एक साथ लेकर चलने के दृष्टिकोण का हिस्सा है। इनमें बंगाल की खाड़ी का केंद्र संघर्ष समाधान और शांति निर्माण केंद्र और सामान्य अभिलेखीय संसाधन केंद्र शामिल है।

वर्तमान समय में नालन्दा विश्वविद्यालय विश्व भर के कई विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के साथ-साथ ICWA, IIPHG, ISI, ICCR, ISAS, IIAS और CSIR के साथ मिलकर काम करता है।

निष्कर्ष

नालन्दा विश्वविद्यालय केवल प्राचीन भारत का एक शिक्षा केंद्र नहीं था बल्कि यह भारत के विश्व-गुरु होने का जीवंत प्रमाण था। जहां की समृद्ध ज्ञान परंपरा बहु सांस्कृतिक अध्ययन और उत्कृष्ट अध्ययन-अध्यापन प्रणाली ने दुनिया भर के विद्वानों को आकर्षित किया। यद्यपि आक्रमणकारियों द्वारा इसके विनाश ने इतिहास के एक स्वर्णिम युग का अंत कर दिया।

लेकिन नालन्दा की आत्मा और विचार आज भी अमर है। हाल ही में नालन्दा का पुनरुद्धार इस बात का प्रतीक है कि भारत अपनी महान ज्ञान की विरासत को सहेजकर पुनः वैश्विक शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों को छूने के लिए तैयार है।

2026-10-14

उस्मानी साम्राज्य

 
ottoman empire article banner image

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम उस्मानी साम्राज्य के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे यह एक ऐसा साम्राज्य था जिसने 14वीं शताब्दी से लेकर 20 शताब्दी तक के समय काल तक पश्चिमी एशिया उत्तरी अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्वी यूरोप तक शासन करता था। 

विविध क्षेत्रों के लोगों पर शासन करने के कारण इन लोगों ने अपने साम्राज्य में कई धार्मिक समुदायों को इस्लामी कानून के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्था स्थापना की थी।

परिचय

यह साम्राज्य उत्तर-पश्चिमी अनातोलिया में लगभग 1299 में तुर्कमान कबीले के नेता उस्मान प्रथम द्वारा स्थापित एक बेयलिक या रियासत से उभरा। उनके उत्तराधिकारियों ने अनातोलिया के अधिकांश भाग पर विजय प्राप्त की और 14वीं शताब्दी के मध्य तक बाल्कन में विस्तार किया। जिससे उनका छोटा सा राज्य एक अंतर महाद्वीपीय साम्राज्य में परिवर्तित हो गया। ओटोमन साम्राज्य ने 1453 में मेहमेद द्वितीय द्वारा कॉन्स्टेंटिनोपल की विजय के साथ बीजान्टिन साम्राज्य का अंत कर दिया।

सेलिम प्रथम द्वारा की गई आगे की विजयों के कारण सुल्तानों ने खलीफा की उपाधि धारण की। कॉन्स्टेंटिनोपल को अपनी राजधानी बनाकर और भू-मध्य सागर बेसिन के एक महत्वपूर्ण हिस्से पर नियंत्रण के साथ ओटोमन साम्राज्य छह शताब्दियों तक मध्य पूर्व और यूरोप के बीच संबंधों का केंद्र रहा। 

विविध लोगों पर शासन करते हुए साम्राज्य ने अपने कई धार्मिक समुदायों को इस्लामी कानून के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए अलग-अलग स्तर की स्वायत्तता प्रदान की। 16वीं शताब्दी में सुलेमान द मैग्निफिसेंट के शासनकाल के दौरान, ओटोमन साम्राज्य एक वैश्विक शक्ति बन गया।

पतन

1683 में वियना की दूसरी घेराबंदी में हार के बाद साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। लेकिन 18वीं शताब्दी के अधिकांश भाग तक इसने एक लचीली और मजबूत अर्थव्यवस्था समाज और सैन्य शक्ति को बनाए रखा। 18वीं शताब्दी के अंत तक शाही सत्ता के विखंडन के कारण ओटोमन साम्राज्य तकनीकी रूप से विशेष कर यूरोप से पिछड़ गया। 

ऑस्ट्रिया और रूस से मिली और हार के परिणामस्वरूप क्षेत्र का नुकसान हुआ और फ्रांसीसी क्रांति के बाद बढ़ते राष्ट्रवाद के साथ  बाल्कन में कई नए राज्यों का उदय हुआ। महमूद द्वितीय के शासन काल और 19वीं शताब्दी के दौरान हुए तंजीमात सुधारों के बाद  ओटोमन राज्य अधिक शक्तिशाली और आंतरिक रूप से संगठित हो गया।

क्योंकि इनकी एक नई ओटोमन पहचान स्थापित हुई। 1876 की क्रांति में ओटोमन साम्राज्य ने स्वयं को संवैधानिक राजतंत्र स्थापित करने का प्रयास किया लेकिन महान पूर्वी संकट के बाद अब्दुल हामिद द्वितीय के अधीन निरंकुश राजतंत्र में वापस लौट आया।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यंग तुर्क  के नाम से जाने-जाने वाले ओटोमन बुद्धिजीवियों ने पश्चिमी तर्ज पर समाज और राजनीति को उदार और तर्कसंगत बनाने का प्रयास किया। जिसका परिणाम 1908 की यंग तुर्क क्रांति में परिणत हुआ जिसका नेतृत्व कमेटी ऑफ यूनियन एंड प्रोग्रेस सीयूपी ने किया और जिसने संवैधानिक राजतंत्र को पुनः स्थापित किया।

हालाँकि विनाशकारी बाल्कन युद्धों के बाद सीयूपी तेजी से कट्टरपंथी हो गई और उसने तुर्की राष्ट्रवाद को अपना लिया जिसके कारण 1913 में तख्तापलट हुआ और तानाशाही स्थापित हो गई।

साम्राज्य का अंत

19वीं और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में ओटोमन साम्राज्य और रूसी साम्राज्य के दौरान मुसलमानों पर हुए अत्याचारों के परिणामस्वरूप बाल्कन काकेशस और क्रीमिया से बड़े पैमाने पर लोगों की जान गई और लोग आधुनिक तुर्की में आकर बस गए। प्रथम विश्व युद्ध में केंद्रीय शक्तियों के पक्ष में सीयूपी शामिल हुआ इसने आंतरिक असंतोष विशेष रूप से अरब विद्रोह का सामना किया और अर्मेनियाई असीरियन और यूनानियों के खिलाफ नरसंहार किया।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद विजयी मित्र देशों ने ओटोमन साम्राज्य पर कब्जा कर लिया और उसे विभाजित कर दिया जिसके दक्षिणी क्षेत्र यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस को मिल गए। मुस्तफा कमाल अतातुर्क के नेतृत्व में कब्जा करने वाले मित्र देशों के खिलाफ सफल तुर्की स्वतंत्रता संग्राम के परिणामस्वरूप 1922 में ओटोमन सल्तनत का अंत हो गया।

साम्राज्य के विस्तार के मुख्य कारक एवं घटनाएं


मुराद द्वितीय के पुत्र मेहमेद द कॉन्करर ने राज्य और सेना दोनों का पुनर्गठन किया और 29 मई 1453 को कॉन्स्टेंटिनोपल पर विजय प्राप्त कर बीजान्टिन साम्राज्य का अंत कर दिया। मेहमेद ने ओटोमन सत्ता को स्वीकार करने के बदले में पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च को अपनी स्वायत्तता और भूमि बनाए रखने की अनुमति दी।

पश्चिमी यूरोप के राज्यों और बाद के बीजान्टिन साम्राज्य के बीच तनाव के कारण अधिकांश ऑर्थोडॉक्स आबादी ने वेनिस के शासन की तुलना में ओटोमन शासन को बेहतर मानते हुए स्वीकार कर लिया।  

15वीं और 16वीं शताब्दी में ओटोमन साम्राज्य ने विस्तार के दौर में प्रवेश किया। प्रतिबद्ध और कुशल सुलतानों की एक श्रृंखला के शासन काल में साम्राज्य समृद्ध हुआ । यूरोप और एशिया के बीच प्रमुख जमीनी व्यापार मार्गों पर नियंत्रण के कारण यह आर्थिक रूप से फला-फूला।

सुल्तान सेलिम प्रथम

सुल्तान सेलिम प्रथम शासन काल 1512-1520 ने चालदिरान की लड़ाई में सफ़वी ईरान के शाह इस्माइल को हराकर पूर्वी और दक्षिणी सीमाओं का नाटकीय रूप से विस्तार किया। सेलिम प्रथम ने मिस्र के ममलुक सल्तनत को हराकर और उसे अपने राज्य में मिलाकर मिस्र में ओटोमन शासन की स्थापना की और लाल सागर पर नौसैनिक उपस्थिति स्थापित की।

इस ओटोमन विस्तार के बाद, क्षेत्र में प्रमुख शक्ति बनने के लिए पुर्तगाली साम्राज्य और ओटोमन साम्राज्य के बीच प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई।

सुलेमान द मैग्निफिसेंट 

सुलेमान द मैग्निफिसेंट शासन काल  1520-1566 ने 1521 में बेलग्रेड पर कब्जा कर लिया ओटोमन-हंगेरियन युद्धों के हिस्से के रूप में हंगरी साम्राज्य के दक्षिणी और मध्य भागों को जीत लिया। 1526 में मोहाक्स की लड़ाई में अपनी ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने वर्तमान हंगरी और अन्य मध्य यूरोपीय क्षेत्रों में ओटोमन शासन स्थापित किया।

फिर उन्होंने 1529 में वियना को घेर लिया लेकिन शहर पर कब्जा करने में असफल रहे। 1532 में उन्होंने वियना पर एक और हमला किया लेकिन गुन्स की घेराबंदी में उन्हें पीछे हटना पड़ा।  ट्रांसिल्वेनिया वालाचिया और समय-समय पर मोल्डाविया साम्राज्य के अधीन रियासतें बन गईं।

पूर्व में ओटोमन तुर्कों ने 1535 में फारसियों से बगदाद छीन लिया इराक में ओटोमन शासन स्थापित किया और फारस की खाड़ी तक नौसैनिक पहुँच प्राप्त की।
 

ओटोमन-सफाविद

ओटोमन-सफाविद युद्ध जो की 1532-1555 में हुआ की समाप्ति के बाद काकेशस पहली बार सफाविद और ओटोमन के बीच विभाजित हो गया। यह स्थिति 19वीं शताब्दी में काकेशस पर रूसी विजय तक बनी रही। अमास्या की शांति संधि में हस्ताक्षरित इस विभाजन के अनुसार पश्चिमी आर्मेनिया पश्चिमी कुर्दिस्तान और पश्चिमी जॉर्जिया ओटोमन के हाथों में आ गए। जबकि दक्षिणी दागेस्तान पूर्वी आर्मेनिया पूर्वी जॉर्जिया और अज़रबैजान फारसी क्षेत्र बने रहे।

मोहाक्स की लड़ाई 

1539 में 60,000 सैनिकों वाली एक ओटोमन सेना ने एड्रियाटिक तट पर स्थित कैस्टेलनुओवो की स्पेनिश चौकी को घेर लिया। इस सफल घेराबंदी में ओटोमन सेना को 8,000 सैनिकों का नुकसान हुआ लेकिन वेनिस 1540 में शर्तों पर सहमत हो गया और उसने एजियन और मोरिया में स्थित अपने अधिकांश साम्राज्य को आत्मसमर्पण कर दिया। हैब्सबर्ग शासन के प्रति आपसी विरोध से एकजुट फ्रांस और ओटोमन साम्राज्य सहयोगी बन गए। 

नीस 1543 और कोर्सिका 1553 पर फ्रांसीसी विजय फ्रांसीसी राजा फ्रांसिस प्रथम और सुलेमान के संयुक्त प्रयास के रूप में हुई और इसका नेतृत्व ओटोमन एडमिरल हायरेद्दीन बारबारोसा और ड्रैगट ने किया। उत्तरी हंगरी में एज़्टरगोम पर 1543 में ओटोमन विजय के दौरान फ्रांस ने एक तोपखाने इकाई के साथ ओटोमन सेना का समर्थन किया।

तुर्कों की और अधिक प्रगति के बाद हैब्सबर्ग शासक फर्डिनेंड ने 1547 में हंगरी में आधिकारिक तौर पर ओटोमन साम्राज्य को मान्यता दी। सुलेमान की मृत्यु 1566 में सिगेटवार की घेराबंदी के दौरान प्राकृतिक कारणों से हुई। उनकी मृत्यु के बाद ओटोमन साम्राज्य का पतन होने लगा हालाँकि कई विद्वानों ने इस बात को खारिज कर दिया है। सुलेमान के शासनकाल के अंत तक साम्राज्य लगभग 2,273,720 किमी² में फैला हुआ था जो की तीन महाद्वीपों में विस्तृत था।

प्रीवेज़ा की लड़ाई 1538

साम्राज्य एक प्रमुख नौसैनिक शक्ति बन गया जिसने भू मध्य सागर के अधिकांश भाग पर नियंत्रण कर लिया। साम्राज्य अब यूरोपीय राजनीति का एक प्रमुख हिस्सा था। स्पेन और पुर्तगाल के इबेरियन संघ के तहत एकजुट होने पर ओटोमन साम्राज्य बहु-महाद्वीपीय धार्मिक युद्धों में शामिल हो गया। 

ओटोमन साम्राज्य खलीफा की उपाधि धारण करता था जिसका अर्थ था कि वे विश्व भर के मुसलमानों के नेता थे। इबेरियन ईसाई धर्मयुद्धियों के नेता थे और इसलिए दोनों ने एक विश्वव्यापी संघर्ष में लड़ाई लड़ी। भू मध्य सागर और हिंद महासागर में युद्ध अभियान क्षेत्र थे। जहाँ इबेरियन अफ्रीका का चक्कर लगाकर भारत पहुँचे और रास्ते में ओटोमन साम्राज्य और उनके स्थानीय मुस्लिम सहयोगियों के बीच युद्ध हुआ।

इसी तरह इबेरियन नव-ईसाईकृत लैटिन अमेरिका से गुजरे और प्रशांत महासागर को पार करते हुए पूर्व मुस्लिम फिलीपींस को ईसाई बनाने और सुदूर पूर्व में मुसलमानों पर हमला करने के लिए इसे एक आधार के रूप में उपयोग करने के लिए अभियान भेजे। इस मामले में ओटोमन साम्राज्य ने दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित अपने पूर्वी जागीरदार और क्षेत्र आचे सल्तनत की सहायता के लिए सेनाएँ भेजीं।

स्पेनिश-ओटोमन युद्ध मुख्य रूप से भूमध्य सागर में हुए। उत्तरी अफ़्रीकी शहरों अल्जीयर्स ट्यूनिस और त्रिपोली के बारबरी समुद्री लुटेरों ने जो नाममात्र के लिए ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा थे। हजारों व्यापारी जहाजों पर कब्जा कर लिया और यूरोप ने तटीय शहरों पर छापा मारा और पकड़े गए लोगों को गुलाम बना लिया।

1600 के दशक के दौरान ओटोमन खिलाफत और इबेरियन संघ के बीच विश्व संघर्ष गतिरोध में था क्योंकि दोनों की जनसंख्या प्रौद्योगिकी और आर्थिक स्तर लगभग समान थे। फिर भी आकार में अंतर के बावजूद समकालीन इतालवी विद्वान फ्रांसेस्को सैंसोविनो और फ्रांसीसी राजनीतिक दार्शनिक जीन बोडिन जैसे लोगों द्वारा ओटोमन राजनीतिक और सैन्य प्रतिष्ठान की सफलता की तुलना रोमन साम्राज्य से की गई थी। 

निष्कर्ष

उस्मानी साम्राज्य विश्व इतिहास के सबसे लंबे समय तक टिके रहने वाले और सबसे प्रभावशाली साम्राज्यों में से एक था। अपने छह शताब्दियों से अधिक के शासन काल में इसने तीन महाद्वीपों की संस्कृतियों व्यापार और राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। हलांकि इसका पतन इसके प्रशासनिक और तकनीकी आधुनिकरण में कमी के कारण हुआ था।

फिर भी इसका ऐतिहासिक प्रभाव आज भी पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप के भू-राजनीतिक मानचित्र पर स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है। 

2026-10-13

लाल किला

 
digital painting of redfort

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम लाल किला के इतिहास के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे हैं तथा भारतीय इतिहास के में इसके महत्व के बारे में समझने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही हम लाल किले के समीप शहर शाहजहानाबाद के ऐतिहासिक महत्व के बारे में चर्चा करेंगे।

इसके साथ ही हम लाल किले पर हुए हमलों तथा लुट की घटना पर चर्चा करेंगे खास बात यह है कि लाल किला कभी भी किसी युद्ध का केंद्र नहीं था।

परिचय

यह एक ऐतिहासिक मुगल किला है जिसे मुगल शासकों द्वारा आगरा से दिल्ली को अपनी राजधानी स्थानांतरित करने के दौरान बनवाया गया था। इस किले का निर्माण मुगल शासक शाहजहाँ द्वारा 12 मई 1639 में करवाया गया था। किले के निर्माण में फारसी और भारतीय स्थापत्य कला शैली का प्रयोग किया गया है। इस किले का प्राचीन नाम किला-ए-मुबारक था जो कि शाही परिवार का निवास स्थान था।

किले के निर्माण में सफेद और लाल पत्थर का इस्तेमाल किया जाने के कारण इस लाल किला कहा जाता है। जिसमें लाल शब्द हिंदी भाषा का है वहीं किला शब्द फारसी भाषा से लिया गया है। खास बात यह है कि इस किले के निर्माण का कार्य उस्ताद अहमद लाहौरी को सौंपा गया था ये वहीं शख्स हैं जिन्होंने ताज महल का निर्माण किया था। जो वर्तमान समय में भी अपनी निर्माण कला शैली तथा अपनी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है।

लाल किला यमुना नदी के किनारे बनवाया गया तथा इसके किनारों पर गहरी खाईयां  खुदवाईं गयी थी। इसका निर्माण कार्य पवित्र इस्लाम के महीने और मुहर्रम के समय में 13 मई 1638 में शुरु किया गया था। इसके साथ ही शाहजहां की देख रेख में यह पूरा किला 6 अप्रैल 1648 में बन कर पूर्ण हुआ। यह किला पूरे शाहजहानाबाद का केंद्र बिंदु था जिसे हम वर्तमान समय में पुरानी दिल्ली के नाम से जानते है।

शाहजहां की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी औरंगजेब ने सम्राट के निजी कमरों में मोती मस्जिद का निर्माण करवा कर लाला किले और समृद्ध बनाने में अपना योगदान दिया। इसके साथ ही उन्होंने महल तक के मार्ग को अधिक घुमावदार बनाने के लिए मुख्य द्वारों के सामने दो बुर्ज का निर्माण भी करवाया था।

पहली लूट की घटना

किले को पहली बार फारसी सम्राट नादिर शाह ने 1739 में लुटा जब उसने 2लाख सैनिक टुकड़ी के साथ मुगल सेना को पराजित किया था। इस समय मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत हो चुकी थी जिसके बाद 1712 में जहांदर शाह को मुगल शासन की गद्दी पर बिठाया गया था लेकिन एक वर्ष बाद ही षड्यंत्र कारियों ने उसकी हत्या कर दी गयी। इस प्रकार 1739 के समय काल में फर्रुखसियर को मुगल शासक बनाया जा चुका था।

अतः फर्रुखसियर की हार के बाद नादिर शाह ने लाल किले को लूटा। इस लूट में मुगल साम्राज्य का मयूर सिंहासन भी था जिसे लूट कर नादिर शाह फारस ले गया। हलांकि इससे पहले वह दिल्ली में लगभग तीन महीनों तक रुका रहा। इस आक्रमण ने शहर को काफी नुकसान पहुंचाया इसी बीच अगला मुगल शासक मुहम्मद शाह को गद्दी पर बिठाया गया। इसके शुरुआती शासन काल से ही मुगल साम्राज्य कमजोर होना प्रारम्भ हो गया था।

मराठों द्वारा शोषण

इस आंतरिक कमजोरी के कारण मुगल शासन सिर्फ नाम मात्र का ही रह गया था। इसी बीच मराठों की बढ़ती ताकत के चलते मुगलों को 1752 में मराठों के साथ संधि हस्ताक्षरित करनी पड़ी। इस संधि के तहत मराठों को  दिल्ली सिंहासन का संरक्षक घोषित किया गया।

1758 में मराठों ने सरहिंद में अफगान शासकों पर अपनी विजय स्थापित की मगर आगे चलकर पानीपत की लड़ाई में मराठों की हार हुई। इस घटना ने मराठों को अहमद शाह दुर्रानी के साथ संघर्ष में धकेल दिया। दुर्रानी से हारने के बाद कर्ज अथवा मुआवजा चुकाने के लिए 1760 में मराठों ने दुर्रानी सेना से दिल्ली की रक्षा के लिए धन जुटाने हेतु दीवाने-ए-खास की चांदी की छत को उतारकर पिघला दिया।

मराठा 1761 में दुर्रानी सेना द्वारा पानीपत की तीसरी लड़ाई में हारने के बाद दुर्रानी सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया। जिसके बाद दिल्ली पर रोहिल्ला अफगान शासक दुर्रानी का प्रशासन 10 सालों तक रहा। जिसके बाद सम्राट शाह आलम द्वितीय के आदेश पर मराठों ने एक बार फिर से आक्रमण किया और दुर्रानी सेना को हराकर फिर से दिल्ली पर मुगल प्रशासन स्थापित किया।

1764 का आक्रमण

यह आक्रमण भरत पुर के जाट शासक महाराजा जवाहर सिंह द्वारा किया गया जिसमें उन्हें जीत भी हासिल हुई। जवाहर सिंह ने 40000 सैनिक टुकड़ी के साथ अवध से जोधपुर तक फैले क्षेत्र को लूटा। बात चीत के बाद सिख सेना दिल्ली से पीछे हटने और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को गद्दी पर बिठाने के लिए सहमत तो हुई मगर दिल्ली छोड़ने से पहले जाट समुदाय ने यह शर्त रखी की मुगल शासक दिल्ली में सात सिख गुरुद्वारों का निर्माण करवायेंगे।

मुगल प्रशासन द्वारा इस पर सहमति भी दी गयी अंत में दिल्ली में गुरु द्वारों का निर्माण भी करवाया गया जिसमें से गुरुद्वारा सिस गंज साहिब भी एक था।

1788 का आक्रमण

यह आक्रमण रोहिल्ला गुलाम कादिर ने किया था जो कि नजीब अद-दौला का पोता था। इसने मुगल शाही परिवार की महिलाओं की हत्या करवा दी तथा सम्राट शाह आलम द्वितीय को भी कैद कर दिया। बदले में मराठा शासक महादजी शिंदे ने अपने सैनिकों को शाह आलम को छुड़ाने और रोहिलखंड के घोसगढ़ में छिपे होने की जानकारी मिलने पर उस पर हमला कर दिया और पकड़ कर उसका सर कलम कर दिया गया।

इस जीत की उपलब्धि के रुप में मराठा ध्वज को 1803 तक यानी 15 सालों तक लाल किले पर मराठा ध्वज फहराने की अनुमति दी गई।

1803 का आक्रमण

द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने दिल्ली के युद्ध में दौलत राव सिंधिया के संचालन में लड़ रही मराठा सेना को हराया। जिस कारण से दिल्ली पर लाल किला सहित मराठों का शासन समाप्त हुआ। इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल क्षेत्रों का प्रशासन अपने हाथों में ले लिया।

किले पर कब्जा करने वाले अंतिम मुगल शासक बहादुर शाह जफर ने भारत में कंपनी शासन के खिलाफ 1857 की क्रांति में भाग लिया और अंग्रेजों के विद्रोही बन गए। इस विद्रोह में उनका साथ शाहजहानाबाद की जनता ने दिया।

1857 का विद्रोह

मुगल सत्ता की राजधानी होने और अपनी रक्षात्मक क्षमताओं के बावजूद लाल किला 1857 के विद्रोह के दौरान किसी भी संघर्ष का स्थल नहीं थी। बहादुर शाह ने 17 सितंबर 1857 में किला छोड़ दिया और बाद में ब्रिटिश सेना द्वारा उसे पकड़ लिया गया। 1858 ब्रिटिश सेना द्वारा उन पर मुकदमा चलाने से पहले उन्हें दोबारा लाल किले में लाया गया जिसके बाद इसी वर्ष 7 अक्तूबर को रंगून भेज दिया गया।

मगर विद्रोह के समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने लाल किले को ध्वस्त करने का आदेश जारी किया जिसके चलते किले की 80 प्रति शत संरचनाएं ध्वस्त कर दी गईं। जिनमें वह पत्थर की दीवार भी शामिल थी जो कभी किले को नदी की ओर वाले आगे के हिस्से पर बने मंडपों से जोड़ती थी।

अंग्रेजों द्वारा किले का सारा फर्नीचर य तो हटा दिया गया य नष्ट कर दिया गया। हरम के कमरे नौकरों की कमरे और बगीचों को ध्वस्त कर दिया गया और उनके ऊपर पत्थर की बैरक की एक पंक्ति खड़ी कर दी गई। शाही परिसर के पूर्वी हिस्से में स्थित संगमरमर की इमारतें पूर्ण विनाश से बच गईं।

हलांकि विध्वंस के दौरान उन्हें नुकसान पहुंचाया गया था इसके साथ ही रक्षात्मक दीवारें और मीनार सुरक्षित रह गए। आंतरिक संरचनाओं का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद लार्ड कर्ज़न जो की 1899 से 1905 के समय काल तक भारत के वायसराय थे ने लाल किले का जीर्णोद्धार करने का प्रयास किया। जिसके तहत इसकी दीवारों का पुनः निर्माण करवाया गया और मीनारें सुरक्षित की गयी।

1947 की घटना

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने लाहौर गेट के ऊपर से  15 अगस्त 1947 को पहली बार तिरंगा फहराया जो भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस का प्रतीक बन गया।

2000 का आतंकवादी हमला

लाल किले पर 22 दिसंबर 2000 को लश्कर-ए-तैबा के छह सदस्यों ने आतंकवादी हमला किया था। इस हमले में दो सैनिक और एक नागरिक मारे गए थे। समाचार मीडिया ने इसे तत्कालीन चल रही भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता को पटरी से उतारने का प्रयास बताया था।

2003

21वीं सदी के बाद इस स्थल में कुछ ही परिवर्तन हुए और लाल किले का उपयोग सैन्य छावनी के रुप में जारी रहा। लाल किले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 22 दिसंबर 2003 तक भारतीय सेना के नियंत्रण में रहा, जब इसे जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपा गया।

2009 में किले के पुनरुद्धार के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा तैयार की गई व्यापक संरक्षण और प्रबंधन योजना सी सी एम पी की घोषणा की गई।

2018 डालमिया समूह

अप्रैल 2018 में डालमिया समूह ने सरकार की विरासत गोद लें योजना के तहत 25 करोड़ के अनुबंध के माध्यम से पांच साल की अवधि के लिए लाल किले के रखरखाव विकास और संचालन का जिम्मा लिया था। पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

एक निजी संस्था द्वारा लाल किले को गोद लेने से व्यापक आक्रोश और बहस छिड़ गई, जिससे जनता इतिहासकारों और राजनीतिक दलों की आलोचना हुई। इस कदम के कारण सोशल मिडीया पर सरकार की बहुत बदनामी हुई। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने मई 2018 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने केंद्रीय पुरातत्व सलाहकार बोर्ड निष्पक्ष समीक्षा किए जाने तक समझौते को निलंबित करने की मांग की।

2019 के दौरान 

21 वीं सदी में लाल किला परिसर में कई संग्रहालय और दीर्घाएं जोड़ी गई हैं। इनमें से चार संग्रहालय जिनका उद्घाटन 2019 में हुई था। परिसर के भीतर औपनिवेशिक काल की बैरकों में स्थित हैं। बैरक बी1 1857 की स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित है। बैरक बी 4 जिसे दृश्यकला के नाम से जाना जाता है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और दिल्ली आर्ट गैलरी के बीच एक सहयोग है और भारतीय कला का प्रदर्शन करता है।

भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय मुमताज महल संग्रहालय और नौबत खान संग्रहालय सहित पहले के संग्रहालयों को बंद कर दिया गया है और उनके प्रदर्शनों को इन नव स्थापित संग्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया है।

2021 भारतीयों किसानों का विरोध स्थल

26 जनवरी 2021 को भारतीय किसानों ने गणतंत्र दिवस विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारी किसानों के एक समूह ने किले में घुसपैठ की और विद्रोह के प्रचार में झंडे फहराने के लिए किले के गुंबदों पर चढ़ गए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों के कारण किले को नुकसान पहुंचा। पुलिस की चेतावनी के बाद इसे खाली करा लिया गया।

2025 दौरान

यह स्मारक पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण प्रभावित हो रही है जिसके कारण लाल किले का रंग लाल से काला हो गया है। सितंबर 2025 में हुए हालिया इतालवी-भारतीय अध्ययनों के अनुसार वायु प्रदूषण की बार-बार होनी वाली घटनाओं ने लाल किले की दीवारों पर चिपचिपी काली पपड़ी बनने में योगदान दिया है। ये काली पपड़ी प्रदूषण के कारण होती है जिनमें मुख्य कण नाइट्रोजन डाइआक्साइड कार्बन मोनोआक्साइड और सीसा तांबा और जस्ता जैसी जहरीली धातुएं शामिल है।

निष्कर्ष

यह किला केवल पत्थरों की इमारत नहीं बल्कि भारत के गौरवशाली इतिहास और मुगल काल की स्थापत्य काला का अद्भुत प्रतीक है। हर साल यहां 15 अगस्त को प्रधान मंत्री द्वारा तिरंगा झण्ड़ा फहराया जाना देश की आजादी और सम प्रभुता की याद दिलाता है। अतः हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए ये हमारी जिम्मेदारी है की हम इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखें ताकि हमारे आगे आने वाली पीढ़ियां हमारे इतिहास और संस्कृति को याद रखें।

लाल किले को वर्ष 2007 के समय काल के दौरान यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में शामिल किया गया था। जिसका मुख्य कारण मुगल वास्तु कला ऐतिहासिक महत्व तथा इसमें मिलने वाले इस्लामी पर्सियन तिमुरिद तथा हिंदू कला के संयोजन के कारण इसे यह दर्जा दिया गया है। 

2026-10-12

ऊदा देवी

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम महान क्रांतिकारी महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ऊदा देवी के बारे में बात करने जा रहे है जिन्हें हम उदय देवी पासी के नाम से भी जानते है। लखनऊ विद्रोह के दौरान उन्होंने एक गुप्त बंदूक निशाने के बाज जिसे अंग्रेजी में स्नाइपर भी कहते है की भूमिका निभा थी।

उनके प्रारम्भिक जीवन के बारे में ज्यादा साक्ष्य नहीं मिल पायें है मगर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके कार्यों के हमारे द्वारा भुलाया जा सके। लखनऊ विद्रोह के दौरान उनकी अहम भूमिका थी।

जीवन परिचय

उदय देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ के पास उजियरांव जिसे वर्तमान समय में गोमती नगर  एक साधारण गरीब परिवार में हुआ था। उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में ऐतिहासिक दस्तावेज बहुत कम मिल पायें हैं जिनके कारण उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल पायी है। बताया यह भी जाता है कि उस समय काल के दौरान आम और गरीब तबके के स्वतंत्रता सेनानियों का लिखित ब्योरा कम ही रखा जाता था।

ऊदा देवी का विवाह मक्का पासी से हुआ था जो कि अपने समय के जाने माने पहलवान थे और अवध के नवाब वाजिद अली शाह की सेना में सैनिक थे। विवाह के बाद उन्होंने लखनऊ में समाज संघर्ष को काफी करीब से देखा था। जब ब्रिटिश सेना ने अवध के नवाब को उनके पद से हटा दिया और लखनऊ में ब्रिटिश राज की स्थापना की।

तब लखनऊ में ब्रिटिश राज के खिलाफ असंतोष फैल गया जिसके परिणामस्वरूप लखनऊ विद्रोह की शुरुआत हुई। इस समय काल के दौरान ऊदा देवी के परिवार पर भी इस संघर्ष का गहरा असर पड़ा। 1857 को विद्रोह के दौरान जब ब्रिटिश सेना ने लखनऊ की रेजिडेंसी को घेर लिया और भीषण संघर्ष छेड़ दिया तब ऊदा देवी ने चुपचाप अपनी भूमिका तैयार की विद्रोहियों के साथ युद्ध में शामिल हुईं।

इस प्रकार उन्होंने तथा अन्य वीर महिलाओं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध में अपने भूमिका अदा की।

विद्रोह की घटना

1857 की वर्षा ऋतु में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बढ़ते प्रभुत्व के विरुद्ध दिल्ली झांसी और कानपुर के क्षेत्रों में एक व्यापक विद्रोह भड़का इस विद्रोह के दौरान ही लखनऊ में भी विद्रोह भड़का जिसके तहत विद्रोहियों ने लखनऊ को विद्रोहियों ने घेर लिया 

इस बीच लखनऊ में 2200 ब्रिटिश सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी गोमती नदी के किनारे विद्रोहियों से घिरी हुई थी और उनके पास पर्याप्त राशन समाप्त हो गया था। जिसके कारण भूख से मरने की अपेक्षा ब्रिटिश सैनिकों का राहत दस्ता आगे बढ़ा जिनके पास पर्याप्त हथियारों की भी कमी थी का सामना ऊदा देवी की विद्रोही सेना से होता है।

सिकंदर बाग का युद्ध

क्रांतिकारी ऊदा देवी ने 16 नवंबर 1857 में सिकंदर बाग की लड़ाई में हिस्सा लिया था। वे अपनी बटालियन को निर्देश देने के बाद स्वयं एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गईं और आगे बढ़ते ब्रिटिश सैनिकों पर गोलीबारी शुरु कर दी। एक ब्रिटिश अधिकारी ने उन्हें देख लिया वे उस समय अपने सहयोगियों को निर्देश दे रही थी साथ ही उन्हें भी गोलियों से कई घाव लगे थे।

अतः अंग्रेजों द्वारा देखे जाने के कारण उन्हें गुप्त स्नाइपर समझ कर ब्रिटिश अधिकारियों ने पेड़ की तरफ सैनिकों को गोली चालने का आदेश दिया जिसके परिणामस्वरूप ऊदा देवी जमीन पर गिरकर मारीं गईं। इस घटना का वृतांत देते हुए विलिय फोर्ब्स मिटचेल अपनी किताब रेमिनिसेंस आफ द ग्रेट म्यूटिनी में लिखते है कि वे दो भारी पुराने पैटर्न की घुड़सवार सेना पिस्तौल से लैस थीं जिनमें से एक अभी भी भरी हुई थी और उनकी बैल्ट में लटक रही थी।

और उनकी गोलियों की  थैली अभी भी आधी भरी हुई थी जबकि हमले से पहले सावधानी पूर्वक तैयार किए गए अपने ठिकाने से उन्होंने लगभग आधे दर्जन से अधिक लोगों को मार गिराया था।

भारत सरकार द्वारा उनके नाम पर किए कार्य

उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके नाम पर 20 मार्च 2021 को प्रांतीय सशस्त्र आरक्षित पुलिस बल महिला बटालियन की स्थापना की  जिसे हम PAC के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही सरकार ने घोषणा की कि ऊदा देवी के साथ ही रानी अवंतीबाई झलकारीबाई के नाम पर भी पीएसी महिला बटालियन की स्थापना की जायेगी।

इस सभी बयान यूपी सरकार के तत्कालीन मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ द्वारा रानी अवंतीबाई लोधी की पुण्य तिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम सभा को संबोधित करते हुए कहा गया।

हाल ही में लखनऊ में वीरांगना ऊदा देवी के शौर्य को चिरस्थाई बनाने के लिए उनकी भव्य प्रतिमा की स्थापना सिकंदर बाग और वृंदावन कालोनी क्षेत्र के पास स्थापित की गई है जिसका अनावरण यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी द्वारा किया गया है।

इसके साथ ही नई पीढ़ी को देश के गुमनाम नायकों और स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जोड़ने के लिए बेसिक शिक्षा परिषद के पाठ्यक्रम की किताबों में उनके जीवन और संघर्ष से जुड़े अध्यायों को शामिल किया गया है।

हर साल 16 नवंबर को उनके बलिदान दिवस के दिन सरकारी स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जहां देश के बड़े नेता और प्रशासनिक अधिकारी उनके बलिदान को याद करते हुए उन्हें नमन करते है।

खास बात यह भी है कि वर्तमान समय में सरकार द्वारा उन सभी ऐतिहासिक स्थलों और स्मारकों का पुनरुद्धार कराया जा रहा है जिनका संबंध 1857 की क्रांति और स्वतंत्रता सेनानियों के इतिहास से जुड़ा हुआ है।

उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी उनके सम्मान में कार्य किए गए है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के महू छावनी में उनकी मूर्ति की स्थापना और लोकार्पण किया गया है ताकि देश उनको स्मरण रख सके।

उनके नाम पर एक पंजीकृत सामाजिक संगठन की स्थापना की गई है ताकि उनके आदर्शों महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय के विचारों को आगे बढ़ाया जा सके।  

निष्कर्ष

ऊदा देवी का जीवन यह सिद्ध करता है कि देश की स्वतंत्रता के लिए केवल पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी उतनी ही आक्रामकता और वीरता से आगे आईं। सिकंदर बाग के पेड़ पर बैठकर अकेले ही ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे कर देना उनके अदम्य साहस का सर्वोच्च उदाहरण है।

वे समाज के उस वंचित और शोषित वर्ग से आती थीं जिन्हें पारंपरिक इतिहास में लंबे समय तक उचित स्थान नहीं मिल पाया था। उनका संघर्ष यह बताता है कि देश की आजादी में हर वर्ग और हर जाति के लोगों ने बराबर का बलिदान दिया है।

इसके साथ ही ऊदा देवी जैसी वीरांगनाओं का जीवन हमें यह सिखाता है कि इतिहास के पन्नों को पहचानना और सम्मन देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमारी वर्तमान स्थिति को अग्रसर किया। 

उनका जीवन आज की पीढ़ी और विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। उनका बलिदान सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अन्याय के खिलाफ डटकर मुकाबला कैसे किया जाता है। सरकार और समाज द्वारा उनके नाम पर बनाई गई बटालियन और मूर्तियां और स्मारक केवल उनके नाम को ही जीवित नहीं रखते बल्कि आने वाली पीढ़ियों को देश प्रेम और देश भक्ति का निरंतर पाठ पढ़ाते रहेंगे।

2026-10-11

लखनऊ विद्रोह

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में लखनऊ विद्रोह के दौरान हुई प्रमुख घटनाओं साथ विद्रोह के भड़कने के प्रमुख कारण तथा अंग्रेजों द्वारा विद्रोह को दबाने के प्रमुख प्रयासों के बारे में चर्चा की गयी है। खास बात यह है कि यह विद्रोह 1857 के दौरान ही हुआ था जिसमें मुख्य रुप से सैनिकों ने इसकी शुरुआत की।

दरअसल भारतीय सैनिक पहले से ही कम वेतन पदोन्नति की सीमित अवसरों साथ ही गाय और सूअर चमड़ी का प्रयोग हुई कारतूसों को न चलाने और अवध क्षेत्र के पुनर्गठन से जुड़ी शिकायतों के कारण हुआ था। 

ब्रिटिश अधिकारों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को प्रशासन को ठीक से न चला पाने के आरोप में उनके पद से हटा दिया तथा अवध की राजधानी लखनऊ पर अपना अधिकार स्थापित करने के साथ ही वाजिद अली शाह को कलकत्ता में ले जाकर नजरबंद कर दिया।

अपने अपमान का बदला लेने के लिए वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल ने आगे आकर कमान संभाली और अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह छेड़ दिया।

परिचय

अवध राज्य को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने अधीन कर लिया था और नवाब वाजिद अली शाह को विद्रोह शुरू होने से एक साल पहले कलकत्ता निर्वासित कर दिया गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी की इस मनमानी कार्रवाई का राज्य और भारत के अन्य हिस्सों में कड़ा विरोध हुआ।

नव अधिग्रहित क्षेत्र में नियुक्त पहले ब्रिटिश आयुक्त वास्तव में राज्यपाल कवरली जैक्सन था। उसका व्यवहार अकुशल था और एक अत्यंत अनुभवी प्रशासक सर हेनरी लॉरेंस ने विद्रोह शुरू होने से मात्र छह सप्ताह पहले पद भार ग्रहण किया था।

पिछले कुछ वर्षों में ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल प्रेसीडेंसी सेना के सिपाही लगातार परेशान होते जा रहे थे क्योंकि उन्हें लगता था कि कंपनी के धर्म प्रचार के प्रयासों से उनके धर्म और रीति-रिवाजों को खतरा है।

लॉरेंस अपने अधीन भारतीय सैनिकों जिनमें अवध राज्य की पूर्व सेना से भर्ती किए गए अवध अनियमित सैनिकों की कई इकाइयाँ शामिल थीं के विद्रोही स्वभाव से भलीभांति परिचित थे।18 अप्रैल को उन्होंने गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को असंतोष के कुछ संकेतों के बारे में आगाह किया और कुछ विद्रोही टुकड़ियों को दूसरे प्रांत में स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी।

विद्रोह की शुरुआत एनफील्ड राइफल के प्रचलन से हुई ऐसा माना जाता था कि इस हथियार के कारतूसों पर गोमांस और सूअर की चर्बी का मिश्रण लगा होता था जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों भारतीय सैनिकों का अपमान होता था। 1 मई को अवध की सातवीं अनियमित पैदल सेना ने कारतूस को चबाने से इनकार कर दिया और 3 मई को अन्य रेजिमेंटों ने उन्हें निहत्था कर दिया।

10 मई को मेरठ में भारतीय सैनिकों ने खुले आम विद्रोह कर दिया और दिल्ली की ओर कूच किया। जब इसकी खबर लखनऊ पहुंची तो लॉरेंस ने संकट की गंभीरता को समझा और अपने घरों से पेंशन भोगियों के दो समूहों को बुलाया।

जिनमें एक सिपाहियों का और दूसरा तोपखाने के सैनिकों का। इन पेंशन भोगियों सिखों और कुछ हिंदू सिपाहियों की वफादारी के कारण ही रेजिडेंसी की सफल रक्षा संभव हो पाई।

प्रारम्भिक घटना

23 मई को लॉरेंस ने रेजिडेंसी को मजबूत करना और घेराबंदी के लिए रसद जुटाना शुरू कर दिया बड़ी संख्या में ब्रिटिश नागरिक दूर दराज के जिलों से वहां पहुंचे। 30 मई मुस्लिम त्योहार ईद-उल-फितर को लखनऊ में तैनात अवध और बंगाल की अधिकांश सेना ने खुले आम विद्रोह कर दिया। 

स्थानीय रूप से भर्ती किए गए पेंशनभोगियों के अलावा लॉरेंस के पास ब्रिटिश 32वीं पैदल सेना रेजिमेंट की अधिकांश टुकड़ियां भी उपलब्ध थीं और वे विद्रोहियों को शहर से खदेड़ने में सफल रहे।

4 जून को लखनऊ से 82 किलो मीटर दूर स्थित एक बड़े और महत्वपूर्ण केंद्र सीता पुर में विद्रोह हुआ। इसके बाद प्रांत के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में से एक फैजाबाद में भी विद्रोह हुआ और दरिया बाद सुल्तानपुर और सलोन में भी विद्रोह भड़क उठे। इस प्रकार दस दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश सत्ता लगभग समाप्त हो गई।

30 जून 1857

30 जून को लॉरेंस को पता चला कि विद्रोही लखनऊ के उत्तर में इकट्ठा हो रहे हैं और उपलब्ध जानकारी की गुणवत्ता कम होने के बावजूद उन्होंने एक विस्तृत टोही अभियान का आदेश दिया। हालाँकि उन्हें सैन्य अनुभव अपेक्षाकृत कम था फिर भी लॉरेंस ने स्वयं इस अभियान का नेतृत्व किया। यह अभियान बहुत सुव्यवस्थित नहीं था।

सैनिकों को भीषण गर्मी में दिन के सबसे गर्म समय में बिना भोजन और पर्याप्त पानी के मार्च करने के लिए मजबूर होना पड़ा, और चिनहट की लड़ाई में उनका सामना बरकत अहमद के नेतृत्व में एक सुव्यवस्थित विद्रोही सेना से हुआ, जिसमें घुड़सवार सेना और खाइयों में स्थापित तोपखाना शामिल था।

जब उन पर हमला हो रहा था लॉरेंस के कुछ सिपाही और भारतीय तोपची विद्रोहियों के साथ मिल गए उन्होंने अपनी तोपों को उलट दिया और उनके निशान काट दिए ।  उनके थके हुए ब्रिटिश सैनिक अव्यवस्थित रूप से पीछे हट गए। कुछ रेजिडेंसी के पास ही लू लगने से मर गए।

13 वीं  नेटिव इन्फैंट्री के लेफ्टिनेंट विलियम जॉर्ज क्यूबिट को कई साल बाद विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया क्योंकि उन्होंने पीछे हटने के दौरान 32 वीं  रेजिमेंट ऑफ फुट के तीन जवानों की जान बचाई थी।

उनका यह कार्य कोई अनोखा नहीं था। ब्रिटिशों के प्रति वफादार सिपाहियों विशेष रूप से 13 वीं  नेटिव इन्फैंट्री के सिपाहियों ने कई ब्रिटिश सैनिकों की जान बचाई यहां तक ​​कि अपने घायल सैनिकों को छोड़ने की कीमत पर भी जिन्हें भारतीय सिपाहियों ने टुकड़ों में काट डाला था।

1 जुलाई 1857

घेराबंदी की शुरुआत में हुए पहले बमबारी हमलों में से एक 30 जून को हुआ जिसमें  एक नागरिक गिरती हुई छत के नीचे दब गया था। 32 वीं  फुट रेजिमेंट के कॉर्पोरल विलियम ऑक्सनहैम ने भारी गोलीबारी के बीच उसकी जान बचाई और बाद में उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

पहला हमला 1 जुलाई को विफल कर दिया गया जब रेजिडेंसी के पूर्व में स्थित माछी भवन पैलेस  की अलग चौकी को खाली कराकर उड़ा दिया गया। इसमें भारी मात्रा में बिजली और गोला-बारूद जमा था।

ठीक अगले दिन सर हेनरी लॉरेंस एक गोले से बुरी तरह घायल हो गए और 4 जुलाई को उनकी मृत्यु हो गई। 32 वीं रेजिमेंट  के कर्नल जॉन इंग्लीस ने  गैरीसन की सैन्य कमान संभाली। लॉरेंस ने मेजर जॉन बैंक्स को कार्यवाहक सिविल कमिश्नर नियुक्त किया। कुछ समय बाद जब बैंक्स एक स्नाइपर की गोली से मारे गए तो इंग्लीस ने समग्र कमान संभाल ली।

विद्रोह में शामिल हुए लगभग 8000 सिपाही और जमींदारों के कई सौ सिपाही रेजिडेंसी को घेरे हुए थे। उनके पास कुछ आधुनिक तोपें थीं और कुछ पुरानी तोपें भी थीं जिनसे तरह-तरह के तात्कालिक गोले दागे जा सकते थे।

घेराबंदी के पहले सप्ताह के दौरान रक्षा पंक्ति पर हमला करने के कई दृढ़ प्रयास किए गए लेकिन विद्रोहियों के पास एक एकीकृत कमान का अभाव था जो घेराबंदी करने वाली सभी सेनाओं का समन्वय न कर सके।

सैन्य कार्रवाई और बीमारियों के कारण जिनकी संख्या लगातार कम होती जा रही थी फिर भी रक्षकों ने उन्हें पराजित करने के सभी प्रयासों को विफल कर दिया। इसके अलावा उन्होंने कई हवाई हमले किए गए जिनका उद्देश्य विद्रोहियों के सबसे खतरनाक ठिकाने की प्रभावशीलता को कम करना और उनकी तोपों को खामोश करना था।

16 जुलाई 1857

16 जुलाई को मेजर जनरल हेनरी हैवलॉक  के नेतृत्व में एक सेना ने लखनऊ से 77 किलोमीटर दूर कानपुर पर पुनः कब्जा कर लिया। 20 जुलाई को उन्होंने  लखनऊ को राहत देने का प्रयास करने का निर्णय लिया। लेकिन 1500 सैनिकों की अपनी टुकड़ी को गंगा नदी के पार ले जाने में छह दिन लग गए। 

29 जुलाई को हैवलॉक ने उन्नाव में एक युद्ध जीता लेकिन हताहतों बीमारियों और लू लगने से उनकी सेना घटकर 850 रह गई और उन्हें पीछे हटना पड़ा।

इसके बाद हैवलॉक और कानपुर में तैनात अभिमानी ब्रिगेडियर जेम्स नील के बीच तीखी चिट्ठी-पत्री हुई। हैवलॉक को अंततः 257 अतिरिक्त सैनिक और कुछ और तोपें मिलीं और उन्होंने फिर से आगे बढ़ने का प्रयास किया। 4 अगस्त को उन्होंने उन्नाव के पास एक और विजय प्राप्त की। लेकिन एक बार फिर वे इतने कमजोर हो गए कि आगे बढ़ना जारी नहीं रख सके और पीछे हट गए।

हैवलॉक का इरादा अवध के भीतर गंगा के उत्तरी तट पर बने रहने का था ताकि विद्रोहियों की बड़ी सेना को जो उनका सामना कर रही थी रेजिडेंसी की घेराबंदी में शामिल होने से रोका जा सके। लेकिन 11 अगस्त को नील  ने सूचना दी कि कानपुर पर खतरा मंडरा रहा है। पीछे से हमले से बचने के लिए हैवलॉक फिर से उन्नाव की ओर बढ़े और वहाँ तीसरी विजय प्राप्त की। 

फिर वे गंगा के पार वापस लौटे और नवनिर्मित पुल को नष्ट कर दिया। 16 अगस्त को उन्होंने बिठूर  में विद्रोही सेना को पराजित किया जिससे कानपुर पर मंडरा रहे किसी भी नए खतरे को समाप्त कर दिया गया। हैवलॉक की वापसी सामरिक दृष्टि से आवश्यक थी लेकिन इसके कारण अवध में विद्रोह एक राष्ट्रीय विद्रोह में बदल गया क्योंकि पहले से अनिर्णीत जमींदार भी विद्रोहियों के साथ शामिल हो गए।

15 सितंबर  1857

हेवलॉक की जगह मेजर जनरल सर जेम्स आउटराम को कमान सौंपी गई थी । आउट राम के कानपुर पहुंचने से पहले ही हेवलॉक ने एक और राहत अभियान की तैयारी शुरू कर दी थी। उन्होंने इससे पहले रेजिडेंसी में इंग्लिस को एक पत्र भेजा था। जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि वे अपना रास्ता बनाते हुए कानपुर पहुंचें।

इंग्लिस ने जवाब दिया कि उनके पास पर्याप्त प्रभावी सैनिक नहीं हैं और बीमार घायल और निष्क्रिय सैनिकों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए वे ऐसा प्रयास नहीं कर सकते।

उन्होंने तत्काल सहायता की भी गुहार लगाई। इस बीच विद्रोहियों ने रेजिडेंसी में तैनात सैनिकों पर गोलाबारी जारी रखी और सुरक्षा व्यवस्था के नीचे बारूदी सुरंगें भी बिछाईं जिससे कई चौकियां नष्ट हो गईं। हालांकि सैनिकों ने छिटपुट हमलों और जवाबी हमलों से विद्रोहियों को दूर रखा। लेकिन वे दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे थे और भोजन की भी कमी हो रही थी।

आउट्राम 15 सितंबर को अतिरिक्त सैनिकों के साथ कानपुर पहुंचे । उन्होंने राहत बल की कमान हैवेलॉक को सौंपी और लखनऊ पहुंचने तक नाममात्र के स्वयं सेवक के रूप में उनके साथ रहे। इस बल में 3179 सैनिक थे।

जिनमें छह ब्रिटिश और एक सिख पैदल सेना बटालियन तीन तोपखाना बैटरी शामिल थीं। लेकिन केवल 168 स्वयं सेवक घुड़सवार थे इन्हें दो ब्रिगेड में विभाजित किया गया था। जिनका नेतृत्व नील और 78 वीं  हाइलैंडर्स के कर्नल हैमिल्टन कर रहे थे।

18 सितंबर 1857

18 सितंबर को आक्रमण फिर से शुरू हुआ इस बार विद्रोहियों ने खुले मैदान में कोई ठोस मोर्चा नहीं संभाला और कुछ महत्वपूर्ण पुलों को नष्ट करने में भी असफल रहे। 23 सितंबर को हैवलॉक  की सेना ने विद्रोहियों को आलम बाग से खदेड़ दिया जो रेजिडेंसी से चार मील दक्षिण में स्थित एक चारदीवारी वाला पार्क था।

आलम बाग में एक छोटी सी टुकड़ी के साथ सामान छोड़कर उन्होंने 25 सितंबर को अंतिम आक्रमण शुरू किया। भारी बारिश के कारण शहर के आसपास का अधिकांश खुला मैदान जलमग्न हो गया था जिससे अंग्रेजों को घेराबंदी करने में बाधा उत्पन्न हुई और उन्हें शहर के कुछ हिस्सों से सीधे आगे बढ़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

चार बाग नहर पार करने के प्रयास में बल को भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा लेकिन वहाँ एक पुल पर हमला करने के दौरान दस में से नौ सैनिक मारे जाने के बाद ही वे सफल हो पाए। इसके बाद वे नहर के पश्चिमी किनारे का अनुसरण करते हुए दाईं ओर मुड़ गए।

78 वीं  हाइलैंडर्स ने गलत मोड़ ले लिया लेकिन कैसर बाग महल जिसे कैसर बाग भी कहा जाता है के पास एक विद्रोही तोपखाने पर कब्जा करने में सफल रहे।

जिसके बाद वे धीरे-धीरे मुख्य बल में वापस लौट आए और भीषण लड़ाई के बाद शाम होते-होते बल मच्छी भवन पहुँच गया। आउट्राम ने बीच में स्थित इमारतों के बीच सुरंगें खोदकर और सुरंगें बिछाकर रेजिडेंसी के रक्षकों से संपर्क करने के लिए रुकने का प्रस्ताव रखा।

लेकिन हैवेलॉक ने तत्काल आगे बढ़ने पर जोर दिया उन्हें डर था कि रेजिडेंसी के रक्षक इतने सतर्क हो चुके हैं कि अंतिम समय में विद्रोही हमले से वे पराजित हो सकते हैं।

यह आक्रमण भारी सुरक्षा वाले संकरे रास्तों से किया गया। नील विद्रोहियों की बंदूक की गोलीबारी में मारे गए लोगों में से एक थे। कुल मिलाकर राहत बल के 2000 सैनिकों में से 535 सैनिक मारे गए जिनमें से अधिकांश इस अंतिम हमले में मारे गए। राहत मिलने तक रेजिडेंसी के रक्षकों ने 87 दिनों की घेराबंदी सहन कर ली थी और उनकी संख्या घटकर केवल 982 लड़ाकू व्यक्तियों तक सीमित हो गई थी।

24 सितंबर 1857

24 सितंबर को 8 वीं द किंग्स रेजिमेंट ऑफ फुट  के कर्नल ग्रेटहेड के नेतृत्व में 2790 ब्रिटिश सिख और पंजाबी सैनिकों का एक दल  लाहौर गेट से होते हुए दिल्ली से कानपुर तक ब्रिटिश शासन की पुनर्स्थापना के लिए आगे बढ़ा। 9 अक्टूबर को ग्रेटहेड  को आगरा के लाल किले में तैनात ब्रिटिश चौकी से सहायता के लिए तत्काल संदेश प्राप्त हुआ। 

उन्होंने अपनी सेना को आगरा की ओर मोड़ दिया जहाँ उन्हें पता चला कि विद्रोही पीछे हट गए हैं। जब उनकी सेना विश्राम कर रही थी तभी पास में ही डेरा डाले हुए विद्रोही सेना ने उन पर अचानक हमला कर दिया। फिर भी उन्होंने एकजुट होकर विद्रोही सेना को पराजित किया और उन्हें तितर-बितर कर दिया। 

आगरा की इस लड़ाई ने दिल्ली और कानपुर के बीच के क्षेत्र से सभी संगठित विद्रोही ताकतों को खदेड़ दिया। हालांकि गुरिल्ला समूह अभी भी मौजूद थे। कुछ समय बाद ग्रेटहेड को दिल्ली से अतिरिक्त सैनिक प्राप्त हुए और मेजर जनरल जेम्स होप ग्रांट को कमान सौंपी गई।

ग्रांट अक्टूबर के अंत में कानपुर पहुंचे जहां उन्हें भारत के नए कमांडर-इन-चीफ सर कॉलिन कैंपबेल से आलम बाग जाने और बीमार व घायल सैनिकों को कानपुर पहुंचाने का आदेश मिला। उन्हें यह भी स्पष्ट रूप से कहा गया था कि कैंपबेल के स्वयं पहुंचने तक वे लखनऊ में किसी भी प्रकार की सहायता के लिए प्रतिबद्ध न हों।

3 नवंबर 1857

जुलाई 1857 में जब कैंप बेल 65 वर्ष के थे तब उन्होंने बंगाल सेना की कमान संभालने के लिए इंग्लैंड छोड़कर भारत भेजा दिया गया। अगस्त के मध्य तक वे कलकत्ता में थे और देश के भीतरी इलाकों में जाने की तैयारी कर रहे थे। सभी तैयारियाँ अक्टूबर के अंत तक पूरी हुईं। 

ग्रैंड ट्रंक रोड पर लड़ते हुए आगे बढ़ते हुए कैंप बेल 3 नवंबर को कानपुर पहुँचे और  लखनऊ की रक्षा शुरू करने से पहले वहाँ के ग्रामीण इलाकों को सुरक्षित कर लिया। कानपुर के आत्मसमर्पण के बाद ब्रिटिश महिलाओं और बच्चों के नरसंहार की यादें अभी भी ताज़ा थीं। अंग्रेजों की नज़र में लखनऊ उनके संकल्प का प्रतीक बन गया था। 

तदनुसार कैंप बेल ने कानपुर की रक्षा के लिए 1100 सैनिकों को वहीं छोड़ दिया और 600 घुड़सवार 3500 पैदल सेना और 42 तोपों के साथ आलमबाग की ओर प्रस्थान किया जिसे सैमुअल स्माइल्स ने महिलाओं और बच्चों को प्राथमिकता के प्रोटोकॉल का एक उदाहरण बताया।

ब्रिटिश युद्ध पोतों को हांगकांग से कलकत्ता भेजा गया। शैनन पर्ल और सैंसपेरिल के नौसैनिकों और नाविकों ने जहाजों की तोपों के साथ एक नौसैनिक ब्रिगेड का गठन किया और कलकत्ता से लड़ते हुए कैम्पबेल की सेना से मिल गए।

लखनऊ में विद्रोहियों की संख्या का व्यापक अनुमान 30000 से 60000 के बीच लगाया गया था। वे पर्याप्त हथियारों से लैस थे उनमें शामिल सिपाही रेजिमेंट अच्छी तरह से प्रशिक्षित थीं। उन्होंने हेवलॉक और आउट्राम द्वारा रेजिडेंसी को पहली बार राहत पहुँचाने के बाद अपनी रक्षा व्यवस्था को और मजबूत कर लिया था। आलम बाग के ठीक उत्तर में स्थित हेवलॉक और आउट्राम द्वारा इस्तेमाल किए गए चार बाग पुल को बंद कर दिया गया था।

दिलकुशा पुल से चार बाग पुल तक चारबाग नहर पर बांध बनाकर उसे पानी से भर दिया गया था ताकि सैनिक या भारी तोपें उसे पार न कर सकें। गोमती नदी के उत्तर में खाइंयों में तैनात तोपें न केवल प्रतिदिन घिरी हुई रेजिडेंसी पर बमबारी करती थीं बल्कि राहत के एकमात्र व्यवहार्य मार्ग पर भी लगातार हमले करती थीं।

हालांकि सिपाहियों के बीच एक एकीकृत कमान संरचना की कमी ने उनकी भारी संख्या और रणनीतिक स्थिति के महत्व को कम कर दिया।

14 नवंबर 1857

14 नवंबर को भोर होते ही कैम्पबेल ने लखनऊ को राहत पहुँचाने का अभियान शुरू किया। उन्होंने अपनी योजना कैवनाघ से मिली जानकारी और लखनऊ राहत दल के पहले दस्ते को हुए भारी जान माल के नुकसान के आधार पर बनाई थी। चारबाग पुल पार करके लखनऊ की तंग और घुमावदार गलियों से होकर लड़ने के बजाय कैम्प बेल ने पूर्व की ओर से घेराबंदी करते हुए दिलकुशा पार्क की ओर बढ़ने का विकल्प चुना। 

इसके बाद वे ला मार्टिनियर ब्रिटिश और एंग्लो-इंडियन लड़कों का एक स्कूल की ओर बढ़े और गोमती नदी के जितना संभव हो सके पास नहर पार की। आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने गोला-बारूद और आपूर्ति की रक्षा करते हुए प्रत्येक स्थान को सुरक्षित किया।

फिर उन्होंने सिकंदरबाग नामक एक चारदीवारी वाले क्षेत्र को सुरक्षित किया और उसे रेजिडेंसी से जोड़ा जिसकी बाहरी सीमा को हैवेलॉक और आउट्राम ने चुत्तूर मंजिल तक बढ़ा दिया था।

आलम बाग के पूर्व में 3 मील तक जब सैन्य टुकड़ी आगे बढ़ी तो उसे किसी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जब राहत टुकड़ी दिल कुशा की दीवार पर पहुँची तो सन्नाटा तोपों की गड़गड़ाहट से टूट गया। ब्रिटिश घुड़सवार सेना और तोपखाने ने तेजी से दीवार को भेद दिया। इसके बाद टुकड़ी ला मार्टिनियर की ओर बढ़ी। 

दोपहर तक दिलकुशा और ला मार्टिनियर ब्रिटिश सेना के कब्जे में थे। बचाव कर रहे सिपाहियों ने बैंक हाउस से ब्रिटिश सेना के बाएं हिस्से पर जोरदार हमला किया। लेकिन ब्रिटिश सेना ने जवाबी हमला किया और उन्हें वापस लखनऊ की ओर खदेड़ दिया। कैम्पबेल के दल की तीव्र प्रगति ने उसे आपूर्ति काफिले से काफी आगे कर दिया। 

अगले दिन राहत टुकड़ी ला मार्टिनियर से उत्तरी छोर तक आगे बढ़ी जहाँ नहर गुमती नदी से मिलती है। दिलकुशा पुल के नीचे के क्षेत्र को जलमग्न करने के लिए नहर पर बांध बनाने के कारण नहर उस स्थान पर सूख गई थी। टुकड़ी और तोपें आगे बढ़ीं और फिर सिकंदर बाग की ओर तेज़ी से बाईं ओर मुड़ गईं।

सिकंदर बाग पर हमला

सिकंदर बाग लगभग 100 वर्ग मीटर का एक ऊँची चारदीवारी वाला बगीचा था जिसके प्रत्येक कोने पर प्राचीरें थीं और दक्षिणी दीवार पर एक मेहराब दार मुख्य प्रवेश द्वार था। कैम्पबेल का दस्ता बगीचे की पूर्वी दीवार के समानांतर चलने वाली सड़क से आगे बढ़ा।

पैदल सेना घुड़सवार सेना और तोपखाने के बढ़ते दस्ते को तंग गाँव की गलियों में आगे बढ़ने में काफी कठिनाई हुई। बगीचे के सामने बने ऊँचे सड़क तटबंध ने उन्हें भारी गोलाबारी से कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान की। 

सिकंदर बाग और पास की किलेबंद झोपड़ियों में बने छेदों से बंदूकों की गोलियाँ चल रही थीं और दूर स्थित कैसरबाग अवध के पूर्व राजा वाजिद अली शाह का महल से भी तोपों के गोले दागे जा रहे थे। कैम्पबेल ने इस गोलाबारी को रोकने के लिए तोपखाने तैनात किए।

भारी 18-पाउंडर तोपों को भी रस्सी से खींचकर खड़ी सड़क तटबंध के ऊपर से ले जाया गया और बाड़े से 55 मीटर की दूरी पर रखा गया। इन सैन्य अभ्यासों में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान हुआ लेकिन तोपखाने की गोलाबारी ने सिकंदर बाग की दक्षिण-पूर्वी दीवार को भेद दिया।

शाह नजफ पर आक्रमण

दोपहर ढलते-ढलते एड्रियन होप के नेतृत्व में राहत टुकड़ी सिकंदर बाग से अलग होकर शाह नजफ की ओर बढ़ी। शाह नजफ एक चारदीवारी वाला इमामबाड़ा और मस्जिद है जो 1814 में अवध के पहले राजा गाज़ी-उद-दीन हैदर का मकबरा भी था। रक्षकों ने इस बहुमंजिला किलेबंदी को भारी मजबूती से स्थापित कर रखा था। 

जब ब्रिटिश टुकड़ी की पूरी ताकत शाह नजफ पर पहुंची तो सिपाहियों ने लगातार राइफलों तोप के गोलों और कैसर बाग से सहायक तोपों की गोलाबारी के साथ-साथ गोमती नदी के उत्तर में स्थित सुरक्षित तोप खानों से तिरछी गोलाबारी करके जवाब दिया। अत्यधिक असुरक्षित स्थानों से अंग्रेजों ने तीन घंटे तक शाह नजफ की मोटी दीवारों पर भारी तोपों से गोलाबारी की।

दीवारें को कोई नुकसान नहीं हुआ सिपाहियों की गोलाबारी निरंतर जारी रही और अंग्रेजों का नुकसान बढ़ता गया। अतिरिक्त ब्रिटिश हमले विफल रहे और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि ब्रिटिश कमान ने उनकी असुरक्षित स्थिति से पीछे हटना भी उतना ही खतरनाक माना।

शाह नजफ तक पहुँचने के लिए वैकल्पिक मार्ग खोजने के लिए पचास हाइ लैंडर्स को भेजा गया। लड़ाई के दूसरी ओर दीवार में एक दरार का पता चलने पर सुरंग खोदने वाले यंत्रों को दरार को चौड़ा करने के लिए आगे भेजा गया। छोटी अग्रिम टुकड़ी इस दरार से अंदर घुसी आंगन पार किया और मुख्य द्वार खोल दिए।

परिणाम

सन 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लखनऊ का विद्रोह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक घटना थी इस विद्रोह का नेतृ्त्व बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरजिस कादिर को नवाब घोषित करके किया था।

विद्रोहियों ने लखनऊ स्थित ब्रिटिश रेजिडेंसी को लंबे समय यानी कई महीनों तक घेरे रखा जिसमें की बड़े ब्रिटिश अधिकारी जैसे हैनरी लारेंस कर्नल नील मारे गए। शुरूआत में क्रांतिकारियों और स्थानीय तालुकेदारों जिसमें किसान और भारतीय सैनिक शामिल थे के समर्थन से लखनऊ पर भारतीयों का नियंत्रण स्थापित हो गया।

लखनऊ और अवध के क्षेत्र में इस विद्रोह ने केवल सैनिकों तक सीमित न रहकर एक जन-विद्रोह का रुप ले लिया जिसमें आम किसानों और जमींदारों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। 

लेकिन मार्च 1858 में ब्रिटिश सेनापति कालिन कैंप बेल ने भारी सैन्य बल और गोरखा रेजिमेंट की मदद से लखनऊ पर पुनः ब्रिटिश शासन को स्थापित किया। इसके बाद बेगम हज़रत महल ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और नेपाल की तराई में चली गईं जहां बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

व्यापक दीर्घकालिक परिणाम
इस विद्रोह के चलते ब्रिटिश सेना को अधिनियम 1858 पारित करना पड़ा जिसके तहत भारत शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया और ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया।

सेना का पुनर्गठन
क्योंकि अवध के सैनिकों और किसानों ने इस विद्रोह में सबसे आक्रामक भूमिका निभाई थी जिसके कारण से ब्रिटिश सरकार ने सेना में अवध बिहार और मध्य भारत के सैनिकों अनुपात कम कर दिया तथा गोरखा सिख और पठानों को अधिक प्राथमिकता दी।
 
इसके साथ ही अंग्रेजों ने भविष्य में असंतोष रोकने के लिए राज्यों के विलय की नीति यानी Doctrine of Lapse को त्याग दिया और भारतीय राजाओं तथा जमींदारों के अधिकारों व दत्तक पुत्र लेने के अधिकार को मान्यता दी।

निष्कर्ष

संक्षिप्त में हम कह सकते है कि लखनऊ विद्रोह भारतीय इतिहास में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सबसे लंबे संगठित और उग्र विद्रोह में से एक था। यह केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था भले ही इसकी शुरुआत सैनिकों के विद्रोह से हुई थी लेकिन इस विद्रोह में किसान आम जनता और जमींदारों ने भारी संख्या में भाग लिया था।

लखनऊ विद्रोह में यह साबित किया की यदि भारतीय संगठित होकर लड़ें तो अंग्रेजों की नींव हिलाई जा सकती है। इसे कुचलने के लिए अंग्रेजों को अपनी सबसे ताकतवर सेना और गोरखा रेजिमेंट का उपयोग करना पड़ा था। इस विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार की आँखें खोल दीं जिसके चलते उन्हें भारत सरकार अधिनियम 1858 लाना पड़ा।

जिसके चलते ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन भारत से पुरी तरह समाप्त हो गया। हम भारतीयों को इस विद्रोह ने एक चीज़ और सिखाई वे थी एकता अगर हम एक जुट हुए तो किसी को भी खुद पर शासन करने से रोक सकते है। शायद ये हमें य भारतीय शासकों को यह पहले ही पता होता तो गुलामी के दिन आते ही नहीं।

वर्तमान समय में ही ज्यादातर राजनेता और जातिवाद को बढ़ावा देने वाले लोग यह प्रयोग हम पर आजमाते है ताकि हम पर शासन कर सकें हमें मूर्ख बना सकें। अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप गुलाम बन कर रहना पसंद करते है कि स्वतंत्र।