9b45ec62875741f6af1713a0dcce3009 Indian History: reveal the Past

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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

आचार्य जगदीश चन्द्र बोस

jagadish chandra bose

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत देश के महान न्युरोबायोलोजिस्ट तथा वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस के बारे में चर्चा करने जा रहे है। वे देश के पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें रोयल सोसाईटी ने अपना फेलोशिप बनाया था तथा उन्हें हाईयेस्ट साइंटिफीक हानर से सम्मानित किया गया था। इन्हें हम father of plant neurobiology के नाम से भी जानते हैं। दोस्तों इनकी महानता इनकी महानता का प्रमाण यह भी है कि इन्होंने अपनी किसी भी रिसर्च को पेटेंट नहीं कराया। क्योंकि वे मानते थे कि उनकी खोज पर सभी भारतीय के साथ पुरी मानव जाति का अधिकार है।

जीवन परिचय

उनका जन्म 30 नवंबर  1858 को विक्रम पुर  वर्तमान मुंशीगंज बांग्लादेश में हुआ था। उनके पिता भगवान चन्द्र बोस एक डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। उनके पिता जी भी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे वे चाहते थे कि बोस अपनी मातृभाषा और संस्कृति को पहले समझें। उनकी प्रारम्भिक पढ़ाई अंग्रेजी को छोड़कर बांग्ला भाषा यानी एक वर्नाक्यूलर स्कूल में हुई। उनके सहपाठी किसानों तथा मछुआरों के बच्चे थे। यहीं से उनके मन में प्रकृति पौधों एवं जीव जन्तुओं के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ।

इसके बाद उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कालेज से स्नातक की पढ़ाई पुरी की। 1880 में वे चिकित्सा की पढ़ाई के लिए इंगलैंड गए लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण इन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद इन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के christ कालेज से प्राकृतिक विज्ञान में tripos तथा लंदन विश्वविद्यालय से बी एस सी की डिग्री हासिल की।

नस्लीय भेदभाव के खिलाफ संघर्ष

1885 में भारत लौटने पर उन्हें कोलकाता के प्रसिद्ध  प्रेसीडेंसी कालेज में भौतिकी के प्राध्यापक के रुप में अस्थाई नियुक्त किया गया। लेकिन उन्हें भारी नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। अंग्रेजों का मानना था कि भारतीय वैज्ञानिक पढ़ाने के लिए योग्य नहीं है। इसलिए उन्हें एक अंग्रेज प्रोफेसर की तुलना में केवल एक तिहाई वेतन देने का प्रस्ताव रखा गया।

दरअसल 1901 में इन्होंने ही सबसे पहले कहा था कि पेड़ पौधों में जान होती है को प्रमाणित किया मगर उस समय काल के वैज्ञानिक पौधों को एक निर्जीव वस्तु ही मानते थे  यानी वे मानते थे  कि पेड़ पौधों में जीवन नहीं होता। इन्हीं कारणों के चलते उनकी इस खोज को वैज्ञानिकों ने एक जादू कहा और उनका मज़ाक उड़ाया और इसे विज्ञान मानने से इनकार कर दिया। रोयल सोसाइटी ने अगले दस सालों तक उनके रिसर्च पेपर को प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन 100 साल बाद उनकी इसी खोज के चलते उन्हें फादर आफ प्लांट न्यूरोबायलोजी के नाम से सम्मानित किया गया।

स्वाभिमानी बोस ने इस अपमान को स्वीकार नहीं किया परिणामस्वरूप उन्होंने तीन साल तक बिना वेतन लिए छात्रों को पढ़ाया। अतः उनकी खोज के चलते स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। इस प्रकार उन्हें पूरा वेतन दिया जाने लगा तथा उनका पद भी स्थायी कर दिया गया।

प्रमुख आविष्कार


क्रेस्कोग्राफ
यह उनकी सबसे प्रसिद्ध खोज थी दरअसल इसी खोज के चलते वे सफल हो सके यह प्रमाणित करने में जी पौधों में जान होने का प्रमाण दिया। इनकी द्वारा खोजे गये इस यन्त्र के चलते ही पौधों कि गतिविधियों को रिकार्ड कर पाना सम्भव हो सका। यह पौधे की छोटी सी छोटी गति को 10000 गुणा बढ़ा कर दिखाता है। इसके अलावा उन्होंने पौधों के जहर देकर उन्हें मार कर तथा कोलोरोफार्फ दे कर बेहोश करके तथा  पौधे की pulse rate चेक  करके भी दिखाया। उनकी इस खोज ने प्रमाणित कर दिया की पौधे में भी जीवन और संवेदनाएं होती है। वे भी प्रकाश आवाज और ज़हर जैसी चीजों पर जानवरों की तरह प्रतिक्रिया करते है।

Millimeter waves
मार्कोनी से पहले 1895 में कोलकाता में बोस सर ने वायरलेस कम्युनिकेशन का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उन्होंने एक  विशेष प्रकार के सिगनल को तीन दीवारों से आर पार करके उस पार लगे घण्टे को बजा कर दिखाया इसके साथ ही इस फ्रिक्वेंसी के प्रयोग से सामान्य बारूद के ढेर में आग लगा कर दिखाई।

इसके साथ ही उन्होंने गैलिना क्रिस्टल डिटेक्टर्स का भी आविष्कार किया, जिसे आज के सेमीकंडक्टर और माइक्रोवेव तकनीक की नींव माना जाता है।

पेटेंट से इनकार

उन्होंने अपने किसी भी आविष्कार का पेटेंट नहीं कराया, क्योंकि उनका मानना था कि  वैज्ञानिक खोज पर पूरी मानवता का अधिकार होना चाहिए। शायद यहीं वे पीछे रह गए क्योंकि वर्तमान समय में एक छोटी सी चीज़ का भी लोग पेटेंट कराकर लाखों करोड़ों रुपये कमा रहे है काश उन्होंने पेटेंट कराया होता तो आज हमारी वर्तमान प्रस्थिति ऐसी नहीं रहती हमें भी यानी भारत को भी रिवार्ड के रुप में इसका लाभ होता। उदाहरण के लिए वर्तमान समय में विकसित देश इन्हीं कारणों के चलते हमसे आगे हैं।

उनके नाम पर बने महत्वपूर्ण स्मारक

1. J.C Bose University of Science and Technology यह विश्वविद्यालय हरियाणा राज्य के फरिदाबाद जिले में स्थापित है। अपने प्रारम्भिक समय में इसका नाम Y M C A I E था जिसे 2018 में बदलकर उनके नाम पर रखा  गया। इसके अलावा उनके नाम पर कोलकाता में एक कालेज की स्थापना के साथ ही इसके साथ ही उनके नाम पर AJCB Indian Botanic Garden की भी स्थापना की गयी है जहां का विशाल बरगद का वृक्ष पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

इसकी खास बात यह है कि इसकी जड़ों का पता लगा पाना असंभव है क्योंकि बरगद की बेलों को बांस की ड़ण्डीयों से जोड़कर  जमीन से जोड़ दिया गया है जिसके कारण इसकी मुख्य जड़ को देख पाना मुश्किल है। इस वृक्ष की खास बात यह भी है कि यह लगभग 250 सालों से भी अधिक पुराना है।

दोस्तों इस लेख से संबंधी अगर आपके पास भी कोई जानकारी हो तो हमें जरूर बताएं ।

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

आयाम किसे कहते हैं

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प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम दुनिया में पाये जाने वाले उन सभी आयामों के बारे में जानेंगे जो कि खोजें गए है य जिनकी कल्पना कर पाना सम्भव है। यह जानना इस लिए भी जरूरी है क्योंकि दुनिया की सभी रिसर्च और इनोवेशन खोज इन्हीं आयामों की मदद से हुई है। आपको यह जानकार हैरानी होगी कि क्वांटम कम्पयूटर की खोज भी दुनिया के इन्हीं आयामों को जानकर हो पायी है। इसके साथ ही जिन्हें हम भूत प्रेत य पैरानोरमल गतिविधि का नाम देते है वे भी इन्हीं आयामों में से किसी एक आयाम का जीव है। हमारे हिन्दू धर्म में भी इन आयामों का जिक्र हुआ है जैसे की मरने के बाद मनुष्य की आत्मा एक आयाम से दूसरे आयाम में चली जाती है। वेद पुराण में इन्हीं आयामों को लोक के रुप में दर्शाया गया है जैसे पृथ्वी लोग आकाश लोक एवं पाताल लोक आदि। लेकिन अगर शास्त्रों का गहनता से अध्ययन किया जाये तो हमें पता चलता है कि इन लोकों की संख्या तीन न होकर के चौदह है।

वास्तविक आयाम

वास्तविक आयामों की बात करें तो यह सिर्फ चार है जिन्हें हम देख सकते है य महसूस कर सकते  है और आसानी से समझ सकते है। वैज्ञानिकों का दावा है कि मनुष्य तीसरे आयाम में रहता है। वहीं सिट्रिंग थ्योरि के अनुसार आयामों की संख्या 11 है । इसी प्रकार बोसोनिक स्ट्रिंग थ्योरि के मुताबिक आयामों की संख्या 26 बताई गई है। हलांकि इसे सही तरीके अभी तक परिभाषित नहीं किया जा सका इस लिए इसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता है मगर विशेषज्ञों ने इसके माध्यम से गणित की समस्याओं को हल करने में सफलता हासिल की है जिसके के कारण बोसोमनिक थ्योरि को महत्व दिया जाता है। कुछ थ्योरि तो यहां तक कहती है कि हम 64 आयामी दुनिया में रहते है मगर सवाल वही है इसे परिभाषित कौन करेगा।

स्ट्रींग थ्योरि

यहां स्ट्रींग थ्योरि के हिसाब से जो 11 आयामों को परिभाषित किया गया है हम इन्हीं के बारे में चर्चा करेंगे क्योंकि अगर किसी आयामों को परिभाषित करने की सही परिभाषा नहीं निकल पाती तो उन पर बात करना मायने नहीं रखता। मगर इसका मतलब यह नहीं है कि वे वजूद में नहीं है। लगातार वैज्ञानिक इस पर अपनी रिसर्च कर रहें है।

आयामों की संरचना

1.पहला आयाम
इसे हम एक साधारण रेखा से समझ सकते जिस पर रहने वाला व्यक्ति एक छोर से दूसरे छोर पर ही जा सकता है। इसे ऐसे समझें की कोई व्यक्ति विशेष रुप से पूर्व से पश्चिम की यात्रा तो कर सकता है मगर उत्तर से दक्षिण की यात्रा नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए कुछ ऐसे जीव है जो पृथ्वी की सतह पर रेंगते है जो कि सिर्फ आगे पीछे ही जा सकते हैं यहां चींटी को ही लेते है ये जीव सिर्फ गंध की दिशा में चलती है य एक लाईन बना कर चलती है।

2.दूसरा आयाम
इस आयाम का जीव पहले आयाम की तुलना में अधिक कुशल होता है वे पूर्व से पश्चिम एवं उत्तर से दक्षिण दिशा में भी चल सकता है। कागज पर बना मानचित्र एवं घर की बनावट का नक्शा इसी का उदाहरण हो सकता है।  दूसरे उदाहरण में हम एक पक्षी को लेते है जो की आकाश में उड़ता है और चारों दिशाओं में यात्रा कर सकता है।

3.तीसरा आयाम
इस आयाम में हम मनुष्य आते है। हलांकि हमारे तरह अन्य जीव भी इस आयाम में आते है मगर मनुष्य को बौद्धिक क्षमता मिलने के कारण ही हम तीसरे आयाम में आते हैं। जैसे हम एक चींटी के पूरे जीवन चक्र को देख सकते है उसे समझ सकते है। इसी प्रकार हम एक पक्षी के जीवन चक्र को भी देख और समझ सकते है। मगर ये दोनों जीव जो कि हमें देखते तो हैं मगर हमारे जीवन चक्र को नहीं समझ सकते। शायद मनुष्य ने इन्हीं जैसे जीवों के जीवन के समझ कर रेलगाड़ी, हवाई जहाज़ एवं पानी में चलने वाली पण्डुब्बी का निर्माण किया होगा। जिसके चलते मनुष्य तीसरे आयाम में भी यात्रा कर सकता है।
हलांकि की किसी वस्तु को तीन तरफ या 3D डाइमेंशन से देख पाना इसका सबसे सरल उदाहरण है। मगर आगे के आयामों को समझने के लिए हमें सभी आयामों में रहने वाले जीवों के दुनिया को देखने का नजरिया भी समझना जरूरी है।

4.चौथा आयाम
इस आयाम को समय से परिभाषित किया गया है। यह वह आयाम है जिसे हम देख नहीं सकते और न ही काबू कर सकते मगर इसे महसूस करते है जैसे दिन य रात का होना। हमारा जीवन समय के साथ आगे बढ़ रहा है हम इसे पीछे नहीं कर सकते य अपनी उम्र को बढ़ने से नहीं रोक सकते। दूसरे उदाहरण से मान लीजिए आप को किसी से मिलने जाना है उस व्यक्ति ने किसी विशेष जगह का पता बताया और आप वहां पहुंच गए लेकिन वह व्यक्ति वहां नहीं है। अब गलती यहां यह हुई है कि उस व्यक्ति ने मिलने का समय नहीं बताया। अतः समय न बताने के कारण य पुछने के कारण आप उस व्यक्ति से नहीं मिल पाये। इस प्रकार समय हमें तो कंट्रोल कर सकता है मगर हम समय को नहीं।

5.पांचवां आयाम
इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति समय को कंट्रोल कर सकता है यानी वे समय में आगे पीछे जा सकता है। या फिर भूत भविष्य वर्तमान में यात्रा कर सकता है। उदाहरण के लिए वे अपने बचपन को फिर से जी सकता है य अपनी मौत के कारण को य उसे देख सकता है। यहां सबसे खास बात यह है कि वह इसे बदल नहीं सकता। 

वार्महोल

वर्तमान समय में हम समय यात्रा जैसे कथित घटनाओं के बारे में सुनते है लेकिन इसके उचित प्रमाण हमें नहीं मिलते। जैसे वार्महोल से आर पार जाने पर हम समय से आगे पीछे  जाते तो है मगर कितना इसे हम कंट्रोल नहीं कर सकते य फिर वार्महोल कहां पाये जाते है इसका कोई उचित प्रमाण अब तक नहीं मिला है।  पांचवें आयाम की परिकल्पना से हम सिर्फ इतना पता लगा पायें है कि वार्महोल की मदद से समय यात्रा कि जा सकती है यानी सिर्फ इसके अस्तित्व का ही पता चल पाया है।

6.छठवां आयाम
इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपने साथ  होने वाली सभी संभावनाओं को एक साथ देख सकता है। जैसे 1.अगर उसने पढ़ाई की तो आगे चल कर वे डाक्टर बना य इंजीनियर 2.य फिर उसने पढ़ाई नहीं की तो वे मजदूरी करेगा य खुद का कोई रोजगार करेगा। 3.य फिर उसने अपने जीवन में कुछ नहीं किया अंत में किसी कारण वश मारा गया।
इसी तरह की वे 6 से 7  संभावना होते हुए देख सकता है और उसी के हिसाब से अपने वास्तविक जीवन में बदलाव कर सकता है। ज्योतिष शास्त्र की संरचना इसी आयाम से सम्बन्धित है। इस आयाम में रहने वाले व्यक्ति की खास बात यह है कि इन होने वाली सभी जीवन धारा में से किसी एक जीवन धारा का जीवन ही जी सकता है। बताते चलें की क्वांटम कम्प्यूटर की परिकल्पना भी इसी आयाम की मदद से की गयी है।

7. सातवां आयाम
इस आयाम का व्यक्ति किसी भी समय धारा  के जीवन में जा सकता है और उस दुनिया में अपने ही वर्जन य अपने जैसे दिखने वाले व्यक्ति से मिल सकता है और उसके कार्यों में अपनी इच्छा के मुताबिक परिवर्तन कर सकता है। यहां एक जैसी कई दुनिया की परिकल्पना की गई है जिसे हम पैरलल युनिवर्स भी कहते  है।

8.आठवां आयाम
इस आयाम का व्यक्ति उन सभी समय धारा को देख सकता है जो संभावित तो है लेकिन उनका समय अलग तरीके से चलता है जैसे किसी समय धारा य दुनिया में व्यक्ति 80 वर्षों तक जीता है तो किसी में 150 वर्षों तक तो किसी में 800 से 900 वर्षों तक का जीवन संभव है। यानी उम्र के साथ वहां के वातावरण गुरुत्वाकर्षण बल,  गति एवं  प्रकाश में विशेष अंतर पाया जाता है।. यहां पर एक ऐसे भी ब्राह्माण भी परिकल्पना की गई है जिसका समय उलटा चलता है।

कुल मिलाकर आठवें आयाम में हमें उन सभी दुनिया को देखने का अधिकार मिल जाता है जिन्हें हम सोच भी नहीं सकते। ये सभी ब्राह्माण एक पेड़ के समान दिखते है जिनकी जड़ें एक ही जगह पर जा कर जुड़ी हुई है। मगर यहां एक दुनिया अपने करीब दुनिया से बिल्कुल अलग है। जैसे पृथ्वी ग्रह की तरह एक दुसरा ग्रह है जहां आक्सीजन, पानी और सूर्य का प्रकाश नहीं है मगर वहां जीवन सम्भव है। इस ग्रह पर जीवन का स्रोत  कुछ और ही है यहां का मनुष्य धरती पर रहने वाले मनुष्य से बिल्कुल अलग है।
इस प्रकार आठवें आयाम में रहने वाले व्यक्ति इन सभी दुनिया या समय धारा की यात्रा तो नहीं कर सकता मगर इन्हें देख  सकता  है कारण जैसा की हमने बताया वहां जीवन का मुख्य स्रोत  अलग- अलग हैं।

9. नोवां आयाम
इस आयाम में भी छठे आयाम की तरह दुसरी दुनिया में जाने के लिए वार्महोल की संकल्पना की गई है अंतर बस इतना है की छठे आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपने समान दिखने वाली दुनिया या समय धारा में जा सकता है वहीं नौवें आयाम में रहने वाला व्यक्ति अपनी दुनिया य समय धारा से अलग दिखने वाली दुनिया य समय धारा में जा सकता है। जैसा की हमने बताया की एक ऐसी दुनिया भी है जहां समय उलटा चलता है।

वार्महोल

यह वही रास्ता है जिसके माध्यम से समय यात्रा य एक दुनिया से दूसरी दुनिया में यात्रा की जा सकती है जिसके बारे में हमने छठे एवं नौवें आयाम में अभी बताया। वार्महोल को साधारण भाषा में समझें तो मान लीजिए यह दुनिया  एक A4 साइज़ का पेपर है अब इस दुनिया य समय धारा से दुसरी समय धारा में जाने के लिए पेपर  के एक छोर से दूसरे छोर पर जाना है। इस यात्रा के दौरान कई प्रकाश वर्ष का समय लगता है। अब इसी पेपर को अगर हम बीचोबीच से  मोड़ देते है तो कुछ घण्टों में ही हम एक  दुनिया से दूसरी की दुनिया में आसानी से जा सकते है। इसी को वार्म होल कहा गया है।

10. दसवां आयाम
ये वही आयाम है जहां बिगबैंग होते हुए देखा जा सकता है य फिर इसी आयाम के चलते बिगबैंग थ्योरि का निर्माण हुआ। इस आयाम में रहने वाला व्यक्ति ढेर सारी दुनिया का अंत होते और उन्हें बनते हुए देख सकता है। हर एक नई दुनिया का निर्माण दो पुरानी दुनिया के आपस में टकराने से य उनके खतम होने से होता है । शायद इसी आयाम में रहने वाले व्यक्ति को ईश्वर य भगवान कहा जाता है। यानी यह वही आयाम है जिसमें वह सभी संभव संभावना हो चुकी है जो हम सोच भी नहीं सकते य उससे भी ऊपर और अधिक संभावित घटनाएं हो चुकी है जिनकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

11. ग्यारहवां आयाम
1990 के दशक में वैज्ञानिकों ने देखा की स्ट्रिंग थ्योरि को अलग- अलग तरह के ब्राह्माण आपस में टकरा रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप एम थ्योरि के मुताबिक ग्यारहवें आयाम की खोज की गई। इस आयाम में यह परिकल्पना की गई कि इस आयाम में हमारे सभी दसों आयाम एक पतले पर्दे की तरह हवा में तैर रहे हैं। यहां हवा ही वह विशेष पावर य शक्ति है जो इन आयामी दुनियाओं को निश्चत समय पर टकराने की संभावनाएं पैदा करती है। 

यानी इस आयाम में प्रत्येक दुनिया का जीवन चक्र तय किया जाता है। इस आयाम में पाया जाने वाला व्यक्ति ही शायद गाड आफ सुप्रीम यानी भगवानों के भगवान कहलाता है।
दोस्तों इस तरह से हमने इस लेख में वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए सभी ग्यारह आयामों को  एक  सरल भाषा में समझाया है। हो सकता है कि वास्तविकता इससे थोड़ी अलग हो। क्योंकि अभी भी इन आयामों पर रिसर्च चल ही रही है। 

बोसोनिक स्ट्रींग थ्योरि 

इस थ्योरि के मुताबिक कुल 26 आयाम है। लेकिन अभी इन पर ठीक से रिसर्च नहीं हुई हैं। हलांकि इस थ्योरि का निर्माण गणित समीकरणों को सही से बैठाने के लिए किया गया था। जिस कारण इसे भी महत्व दिया  जाता है।

 हिन्दू धर्म के मुताबिक 

हिन्दू धर्म के मुताबिक आयामों की संरचना 14 बताई गयी है जिनके नाम नीचे दिए गए है। खास बात यह है कि हिन्दू धर्म के मुताबिक हम सातवें आयाम में रहते है जिसे हिन्दू धर्म मुताबिक इसे भू-लोक कहा गया है।
इन चौदह आयामों की बात करें तो वे इस प्रकार है 1.सत्यलोक 2 तपलोक 3 जना लोक 4 महार लोक 5 स्वर्ग लोक 6  भवर लोक 7 भू लोक 8 अटला 9 विटला 10 सुहला 11 तलातला 12 गहातला 13 रसा तला 14 पाताला आदि। 
वैसे कुछ वैज्ञानिकों ने तो 64 आयामों तक की परिकल्पना कर दी है। मगर जब तक पूर्ण साक्ष्य हमें नहीं मिलते तब तक हम कोई निश्चित निर्णय तक नहीं पहुंच सकते है।
इस लेख के बारे मे अगर कोई सवाल हैं तो हमसे अवश्य पुन्छे। 

मंगलवार, 7 जुलाई 2026

unbreakable glass

unbreakable glass

प्रस्तावना

इस लेख में हम हाल ही में खोज किए गये एक विशेष प्रकार के ग्लास य शीशे के बारे में बात करने जा रहे है। इस ग्लास की खास बात यह है कि यह टूटने के बाद अपने आप से जुड़ जाता है। हलांकि कई देश जैसे जापान और इज़ारायल ने इसकी खोज पहले ही कर ली थी मगर अब इन देशों की श्रेणी में भारत का नाम भी जुड़ गया है। वैसे देखा जाए तो भारत इस प्रकार की रिसर्च में हमेशा पीछे रहता है और जब तक हम इस प्रकार की खोज में सफल हो पाते है तब तक विदेशी हमसे आगे निकल जाते है और हमें उस खोज का सही लाभ नहीं मिल पाता है।

लेकिन इस बार मामला थोड़ा सा पलट गया है हमने शायद समय से इस खोज को अंजाम दिया है जिससे हम अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं। बताते चलें कि इस प्रकार के ग्लास का प्रयोग वर्तमान समय में मोबाइल फोन तथा एल ई डी पैनल में किए जाने का प्लान है ताकि उन्हें और मजबूत बनाया जा सकें तथा नुकसान को कम किया जा सके। इसके अलावा इस प्रकार के ग्लास का इस्तेमाल अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों में भी किया जा सकता है।

बाइ पाइराज़ोल कार्बिनक क्रिस्टल

भारत मूल के वैज्ञानिकों ने इसे बाइ पाइराज़ोल कार्बिनक क्रिस्टल का नाम दिया है। इसकी खोज कलकत्ता के IISER यानी इण्डियन इंस्टीटूयुट आफ साइंस इडोकेशन एण्ड रिसर्च सेंटर के द्वारा की गयी है। खास बात यह भी है कि इस रिसर्च का सबसे पहले प्रकाशन दूनिया की सबसे प्रसिद्ध जानी मानी प्रशिक्षित साइंस जनरल की पत्रिका ने 2021 में किया था। इसके बाद नेचर पत्रिका जिसे हम नेचर कम्युनिकेशन के नाम से भी जानते हैं  ने भी इस रिसर्च का प्रकाशन अपने पत्रिका में किया था। लेकिन दुःख की बात यह है की अभी तक इस रिसर्च का कोई पेटेंट और  सैंपल हम भारतीयों अभी तक देखने को नहीं मिला है।

रिसर्च के मुख्य कार्यकर्ता

इस रिसर्च को IISER KOLLKATA कैमिकल साइंस की प्रोफेसर माला रेड़्डी एवं भौतिकी विज्ञान की प्रोफेसर निर्मला घोष ने  तथा आई आई टी खरगपुर की टीम ने एक साथ मिलकर पूरा किया था।

फडींग

इस रिसर्च को भारत सरकार की संस्था DST तथा SERB यानी साइंस एण्ड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड के सर्वणाज्यंति फालोशीप प्रोग्राम के तहत फडींग दी गयी थी।

सांइटीफिक नाम

इस ग्लास का सांइटीफिक नाम बाइपाइराज़ोल कार्बनिक क्रिस्टल या पिजोइलेक्ट्रिक आणविक क्रिस्टल के नाम से भी जाना जाता है। अगर आप खुद से इस रिसर्च के बारे में पता करना चाहते है तो अपको dst,gov.in के पेज पर जाकर सर्च करना है self healing property spoted in organic crystals आपको सारे नतीजे मिल जायेंगे। इसके अलावा आप दूसरे लिंक यानी गुगल पर cmalla raddy self healing research आपको रिसर्च पेपर मिल जायेंगा।

इज़ारायल

इज़ारायल ने इस ग्लास का नाम पेप्टाइड आधारित ग्लास रखा है जिसकी खोज telaviv university ने बायोलोजिकल मोलिक्योल में अमीनो एसिड और peptides का इस्तेमाल करके बनाया है। इस ग्लास की खास बात यह कि यह पर्यावरण के अनुकूलित है। अगर यह ग्लास टुट जाता है तो रुम टेम्परेचर या सामान्य वातावरण में ही नमी मिलते ही अपने आप को जोड़ लेता है।

जापान

जापान की टोकीयो युनिवर्सीटी के एक छात्र ने गलती से इस प्रकार के मटेरियल की खोज कर दी। इस पर पहले से किसी टीम को नहीं लगाया गया था। 
 खास बात यह है कि  यह ग्लास भी टूटने पर सामान्य वातावरण में कुछ सेकंड य मिनटों तक आपस में जोड़े रहने पर आपस में अपने आप जुड़ जाता है। यहां हम इस बात का ख्याल रखना है कि टूटा हुआ हिस्सा खोना नहीं चाहिए।

मनुस्मृति

मनुस्मृति क्या है

प्रस्तावना 

प्रस्तुत लेख में हम भारतीय इतिहास के विवादित ग्रंथ मनुस्मृती के इतिहास के बारे में चर्चा करेंगे इसके साथ ही हम देखेंगे की इस ग्रंथ के कौन कौन से वो श्लोक है जो विवाद का मुख्य कारण है। इस ग्रंथ पर यह आरोप भी लगता रहा है कि यह किताब कालसुत्रों के आधार पर उनके श्लोकों को निकाल कर बनाई गई है। कुछ लोगों का तो मानना यह भी है कि यह किताब मानवों के अधिकारों का दमन करती है।

इतिहास

भारुचि
मनुस्मृती के सबसे प्राचीन लेखक का खिताब इन्ही को दिया जाता है इतिहासकारों के अनुसार इन्होंने इस ग्रंथ की रचना 10शताब्दी से उत्तरार्ध  तथा 11वीं शताब्दी के आरम्भिक काल में की थी। मगर विदेशी लेखक अलिवेल इस ग्रंथ की रचना का समय काल 600 से 800 शताब्दी के बीच का मानते है।

इसके आलावा मनुस्मृती के कयी संस्करण भी प्रकाशित भी किए गये है जैसे मनुटिका जिसकी रचना 11वी. शताब्दी में की गयी थी इसके अलावा मानवर्थ मुक्तावली जैसे नाम भी आते है। अब तक मनुस्मृती सम्बन्धित पचास से भी ज्यादा पांडुलिपियां मिल चुकी है जो की 18वी. शताब्दी से अब तक खोजी गईं हैं। 

खास बात यह है कि इन सभी पांडुलिपियों का सिधा सम्बन्ध सीधे तौर पर मनुस्मृती से नहीं है । बस इतना पता चलता है कि इन सभी पांडुलिपियों के श्लोकों का प्रयोग  मनुस्मृती में किया गया है।

नामकरण

मनुस्मृती शीर्षक एक आधुनिक शब्द है जो संस्कृत से लिया गया है। लेकिन इसके वर्तमान मूल में ऐसा कोई विभाजन नहीं था। किताब के मुख्य रुप को चार भागों में विभाजित किया गया है। 1 इसमें दुनिया की रचना 2 धर्म का स्रोत 3 चारो सामाजिक वर्गों का धर्म 4 कर्म का नियम पुनर्जन्म और अंतिम मुक्ति के बारे में चर्चा कि गई है।

खास बात यह कि इन प्राप्त पांडुलिपि में इसे ही लिए श्लोको के प्रयोग से ही आचार संहिता के रुप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा हम मनुस्मृती को मानव धर्म शास्त्र के रुप में भी जानते है। वेदों के बाद यह हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

मुख्य ग्रंथ को श्लोकों में परिभाषित किया गया है। यह ग्रंथ एक संवाद को प्रदर्शित करता है जिसमें एक शिष्य अपने गुरु से सवाल करता है यहां गुरु स्वयं मनु है । शुरुआत के 58 श्लोक मनु को समर्पित किए गये हैं। एवं बाकी के श्लोक उनके शिष्य भृगु को समर्पित किए गये हैं।

खास रचनात्मक श्लोक

यहां हम श्लोक न लिखकर उनका अर्थ लिख रहे है। जैसे 1. धर्म से सभी शूद्र होते है, कर्मों के आधार पर उनका नया वर्ण बनता है। अतः सभी द्विज कहलाते है।

2.धर्म के 10 लक्षण है जैसे धैर्य क्षमा संयम चोरी न करना स्वच्छता इन्द्रियों को वश में रखना बुद्धि विद्या सत्य और क्रोध न करना आदि।
3.किसी को अपना जूठा न खिलाना और न ही किसी का जूठा न खाना, न अधिक भोजन करना और न ही भोजन करने के बाद हाथ मुंह धोये बिना इधर उधर जाना।
4.जो मनुष्य धर्म शास्त्र एवं वेद शास्त्र के अनुकूल तर्क द्वारा अनुसंधान और चिन्तन करता है वही धर्म के वास्तविक स्वरुप को समझ पाता है।

मनुस्मृती के विवादित श्लोक 

1.अध्याय 9 श्लोक 3
महिला को कभी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए, बचपन में पिता , युवावस्था में पति और बुढ़ापे में पुत्रों को उसे नियंत्रण में रखना चाहिए।

2. अध्याय 10 श्लोक 122
शूद्रों को भोजन के लिए दूसरों का जूठा अन्न, पहनने के लिए फटो पुराने कपड़े और बिछाने के लिए टूटी-फूटी चटाई य धान के पौधे या पुआल दिया जाना चाहिए।

3. अध्याय 8 श्लोक 270
यदि कोई नीची जाति का व्यक्ति ऊंची जाति के व्यक्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है य कटु शब्द कहता है तो उसे अत्यंत कठोर शारीरिक दंड देना चाहिए य जीभ काट देनी चाहिए जबकि उच्च वर्ग के लोगों के लिए सज़ा का अनुपात काफी कम है।

4. अध्याय 8 श्लोक 271
यदि कोई शूद्र उच्च वर्ग के व्यक्ति का नाम और जाति लेकर अहंकार से अपमान करता है तो उसके मुंह में 10 अंगुलि के बराबर लोहे की जलती कील डाल देनी चाहिए।

5.अध्याय 8 श्लोक 272
यदि कोई शूद्र गर्व से उन्हें धर्म उपदेश देता है तो राजा को उसके कान और मुंह में खौलता हुआ तेल डलवा देना चाहिए।

6.अध्याय 8 श्लोक 279
यदि कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति को अपने जिस अंग से नुकसान पहुंचाता है तो राजा को उसका वही अंग काट देना चाहिए।

7.अध्याय 8 श्लोक 268
अगर कोई उच्च वर्ग का व्यक्ति अपने से निम्न वर्ग के व्यक्ति का अपमान करता है य उपरोक्त सभी दण्ड निम्न वर्ग के व्यक्ति को देता है तो राजा को उसे सिर्फ मामूली आर्थिक दण्ड देना चाहिए य सर मुण्डवा कर देश से निकाल देना चाहिए।

8. अध्याय 8 श्लोक 379/380
ब्राह्मण चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न करें उसे कभी भी मृत्यु दंड नहीं देना चाहिए य अंग भंग जैसी शारीरिक सजा नहीं दी जा सकती है, उसे केवल देश निकाला य मुंडन की सजा दी जा सकती है।

दोस्तों शायद उपरोक्त कारणों एवं भेदभाव के  चलते ही बी आर अम्बेडकर ने मनुस्मृती को जलाया था और संविधान को सर्वोपरि पुस्तक का दर्जा दिया था। इतिहास में बहुत सी ऐसी चीज़े और किताबें मिलती है जो की भेदभाव के बढ़ावा देतीं है। जिनमें बदलते वक्त के साथ परिवर्तन की जरूरत है।

क्योंकि हमारा मानना है कि प्राकृत ने हम सभी को बनाया है और समय के साथ यह हमें मिटायेगी भी। प्राकृति हमारे साथ-साथ सभी जीव- जन्तुओं  का संरक्षण भी करती है। ऐसे में न तो कोई मनुष्य बहुत बड़ा हो सकता है और न ही बहुत छोटा।

तो इस प्रकार इस ग्रंथ की ज्यादातर मान्यताऐं गलत है। क्योंकि धर्म को मानने के लिए मनुष्य का होना आवश्यक है, कुछ चुनिंदा लोग मात्र कुछ भी नियम बनाकर किसी धर्म को नहीं चला सकते यह हम समझते हैं। खास बात यह है कि इस प्रकार के ग्रंथों को मनुष्यों द्वार ही लिखा गया है तो जाहिर सी बात है वे अपने भी विचार इन ग्रंथों में पिरोते होंगे।

शुक्रवार, 19 जून 2026

indo-greek kingdom इंडो-ग्रीक आक्रमण

indo-greek kingdom
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए तीसरे विदेशी आक्रमण के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं जिसे हम इंडों-ग्रिक आक्रमण के नाम से भी जानते है। इसके साथ ही हम देखेंगे की इनके द्वारा कौन कौन से परिवर्तन भारत में किये गए।

मूल निवास

यह मूल रुप से बैक्टीरिया प्रांत के रहने वाले थे। इन का प्रमुख शासक डेमोट्रियस था जिसकी मदद से इन्होंने उत्तर पश्चिम यानी पंजाब हरियाणा मथुरा तथा पाकिस्तान अफगानिस्तान के क्षेत्रों पर अपना शासन स्थापित किया। यह आक्रमण भारत पर 180 ईसा पूर्व में हुआ था।

प्रमुख शासक

डेमोट्रियस के आलवा इनके प्रमुख शासकों की सूची में मिनांडर menandar का नाम आता है। इसने साकल sakal को अपनी राजधानी बनाकर साकेत यानी अयोध्या और पाटिलपुत्र यानी मगध के क्षेत्रों तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

बौद्ध धर्म से प्रभावित 

मिनांडर बौद्ध धर्म से अत्यधिक आकर्षित हुआ इसका साक्ष्य हमें बौद्ध भिक्षु नागसेन और मिनांडर के दार्शनिक संवाद से मिलता है जो कि प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ मिलिदंपन्ह वर्णित है।

भारतीय संस्कृति पर प्रभाव

1.सिक्के
भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्कों का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया। जिस पर उस समय काल के राजा की तस्वीर एवं नाम अंकित रहता था और दूसरी तरफ बौद्ध की आकृति य उनका उपदेश कुरेदा जाता था। डाई से सिक्के बनाने का चलन यवन शासकों द्वारा ही चलाया गया था। इंडो-ग्रीक से पहले भारत में बने सिक्कों का कोई निश्चित आकार य राजा की पहचान नहीं होती थी। डाई द्वारा सिक्के बनाने के कारण सिक्कों का वजन आकार और शुद्धता निश्चित की गई जिससे व्यापार करना बेहद आसान हो गया। उपरोक्त कारणों के चलते भारत की आर्थिक समृद्धि का विकास हुआ। 

2.गांधार कला Gandhara Art
यूनानी मूर्ति कला और भारतीय मूर्ति कला के संगम से गांधार मूर्ति कला का विकास हुआ। इसी कला के माध्यम से भारत में पहली बार महात्मा बुद्ध क मूर्ति यूनानी देवता अपोलो की तरह बनाई गयी थी। इनके युद्ध से पहले भारत में बौद्ध को प्रतीकों चरण और स्तूपों द्वारा दर्शाया जाता था। उनकी मानव रुप में मूर्ति नहीं बनती थी।इनके द्वारा निर्मित गांधार कला शैली के चलते ही बुद्ध के घुंघराले बाल मूंछे और शारीरिक गठन जैसी मूर्तियां बनाई जाने लगीं।

3.खगोल विज्ञान और ज्योतिष कला
सप्ताह के सात दिनों का नामकरण तथा 12 राशियों की खोज यूनानी प्रभाव से ही विकसित हुई। जिसका प्रमाण भारतीय ग्रंथ गार्गी संहिता से मिलता है। जिसमें लिखा है कि यद्यपि यवन एक बर्बर देश है  फिर भी वे ज्योतिष के विद्वान है इसलिए वे पूजनीय है। इनकी ही वैज्ञानिक कला शैली से ग्रहों की गति ग्रहण की भविष्यवाणी और वर्ष की सटीक गणना करने की यूनानी तकनीकों को भारतीय विद्वानों ने अपनाया और अपने ग्रंथों में शामिल किया।

4.रंगमंच और पर्दा
भारतीय नाटक और रंगमंच में परदे का उपयोग शुरु हुआ जिसे आज भी यवनिका कहा जाता है  जो कि यवन शब्द से बना है।

सांस्कृतिक समन्वय

कई यूनानी शासकों और राजदूतों ने भारतीय धर्म को अपनाया ये ही नहीं तक्षशिला के यवन राजदूत हेलियोडोरस ने मध्य प्रदेश के विदिशा में भगवान विष्णु को समर्पित गरुड़ ध्वज स्तंभ की  स्थापना करवाई।इस प्रकार से देखा जाये तो यवन आक्रमण और उनके शासन का भारतीय संस्कृति शासन और व्यापार पर गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा।

वैश्विक व्यापार

उत्तर-पश्चिम सीमा सुरक्षित होने और ग्रीक संपर्क से भारत का व्यापार मध्य एशिया भू मध्य सागर और रोमन साम्राज्य तक तेजी से फैला।

गुरुवार, 18 जून 2026

शकों का आक्रमण

shak or shaka dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम भारत पर हुए चौथा विदेशी आक्रमण तथा इसके प्रभाव के साथ भारत में शकों को किन राजाओं ने कड़ी टक्कर दी इसके बारे में चर्चा करेंगे।

मूल निवास

शकों का मूल निवास स्थान सिर दरिया घाटी और चीनी के तुर्किस्तान में था। हूणों और यूचू कबीले के दबाव के कारण उन्हें अपना स्थान छोड़कर भारत की ओर आना पड़ा था।खास बात यह है कि भारत आने के बाद शक साम्राज्य मु्ख्य रुप से 5 भागों में विभाजीत हो गया। मुख्य रुप से इनकी राजधानी अफगानिस्तान पंजाब मथुरा गुजरात मालवा और दक्कन में थी।

शकों का प्रथम आक्रमण 2वीं सदी ईसा पूर्व में माउज़ के सहयोग से उत्तर-पश्चिम के हिस्से यानि गांधार और तक्षशिला के क्षेत्र को इंडे-ग्रिक शासकों के साथ किया था। इनका सबसे प्रतापी राजा रुद्रदामन था।

प्रमुख शासक
मोगा moues
यह भारत का पहला शक राजा माना जाता है इसने गंधार और पंजाब में अपना शासन स्थापित किया था।

रुद्रदामन प्रथम
यह पश्चिमी भारत की शाखा का सबसे प्रसिद्ध शक राजा था जिसने काठियावाड़ की सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई थी।

भारत के राजाओं से सामना

इतिहास को कुरदने पर हमें यह पता चलता है कि इनका सामना किसी एक भारतीय राजा से नही बल्कि अलग- अलग कालखंड़ों के तीन महान भारतीय राजवंशों और उनके प्रतापी राजाओं से हुआ था। इन राजाओं ने शकों के केवस कड़ी टक्कर ही नही दी बल्कि उन्हें कई बार बुरी तरह पराजित भी किया।

राजा विक्रमादित्य
57 ईसा पूर्व में जब शकों ने पश्चिमोत्तर से आगे बढ़कर मालवा और उज्जैन पर कब्जा कर लिया, तब उज्जैन के एक स्थानीय हिंदू राजा जिन्हें इतिहास में विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है ने शकों के खिलाफ मोर्चा खोला। यु्द्ध में राजा विक्रमादित्य की जीत हुई। इस समय काल के दौरान भारत में शक सवंत का चलन हो गया था। मगर राजा विक्रमादित्य ने इस विजय के उपरान्त शक सवंत कैलेंडर की जगह विक्रम सवंत का निर्माण करवाया जो कि आज भी चलन में है।

इस विजय के बाद राजा विक्रमादित्य ने शकाारि की उपाधि धारण की थी जिसका अर्थ है शकों का नाश करने वाला।

2.सातवाहन वंश दक्कन 

शकों की क्षहरात शाखा का सबसे शक्तिशाली राजा नहपान था जिसने गुजरात मालवा और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था। उनका मुकाबला दक्षिण के शक्तिशाली सातवाहन राजाओं से हुआ।
1.गोतमीपुत्र शातकर्णाी 
यह सातवाहन वंश के सबसे महान राजा थे जिन्होंने 106 से 130 ईस्वी तक शासन किया था। इन्होंने शक राजा नहपान पर हमला किया और उसे युद्ध में हराकर मार डाला। इस जीत का प्रमाण नासिक के गुफा अभिलेखों और जोगलम्बी से मिले सिक्कों से मिलता है, जिन पर शातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को दोबारा अपने नाम से ढलवाया था।

2.वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी 
नहपान की हार के बाद शकों की दूसरी शाखा कार्दमक वंश के राजा रुद्रदामन प्रथम ने खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने के लिए सातबाहनों पर हमला किया। रुद्रदामन ने गौतमीपुत्र के पुत्र वशिष्ठी पुलुमावी के युद्ध में दो बार पराजित किया। हलांकि वैवाहिक संबंधों को कारण सातवाहन वंश के शासकों के नष्ट नही किया दरअसल रुद्रदामन ने अपनी बेटी का विवाह सातवाहन के राजा से किया था जिसके कारण यह युद्ध रिश्तेदारी में बदल गया।

4.गुप्त राजवंश 
इनका शासन काल 4वां शताब्दी से 5वीं शताब्दी तक का था। इधर शकों का शासन काल भारत में लगभग 400 वर्षों तक खिचता रहा। इनका अंत गुप्त साम्राज्य के राजाओं द्वारा किया गया।
1.समुद्र गुप्त 
इनका शासन काल 335 से 375 ईस्वी. तक का था गुप्त वंश के इस महान विजेता ने अपनी दिग्विजय नीति के तहत पश्चिमी भारत के शक शासकों को अपनी अधीनता स्वीकार करने और टैक्स देने प मजबूर कर दिया।

5.चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य

इनाक शासम काल 375 से 415 ईस्वी तक का था। चंद्रगुप्त द्वितीय का तथा शकों का यह युद्ध इतिहास का सबसो निर्णाय युद्ध था। पश्चिमी भारत यानि गुजरात तथा काठियावाड़ में अभी भी शकों के शासन बचा हुआ था जहां का अंतिम राजा रुद्रसिंह तृतीय था। चंद्रगुप्त द्वितीय ने एक विशाल सैन्य अभियान चलाकर रुद्रसिंह तृतीय को जुद्ध में मार गिराया और शकों के अंतिम साम्राज्य को हमेशा के लिए गुप्त साम्राज्य में मिला लिया। इस महाविजय के बाद ही चंद्रगुप्त द्वितीय ने भी विक्रमादित्य और शकारि की उपाधि धारण की।

इस प्राकर मालवा के स्थानीय राजाओं से शुरु हुआ यह संघर्ष सातवाहनों के शौर्य से गुजरते हुए अंततः गुप्त राजवंश के हाथों शकों के पूर्ण विनाश के साथ समाप्त हुआ।

बुधवार, 17 जून 2026

यूनान का आक्रमण

bharat par unani aakraman

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम Battle of hydespes के बारे में चर्चा करेंगे। यह यूनान का पहला तथा भारत पर हुआ दूसरा विदेशी आक्रमण था। इसके साथ ही हम युद्ध के परिणाम और कारणों पर विस्तार से चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम युद्ध के मुख्य कारक यानी के सिकंदर के जीवन पर भी प्रकाश डालेंगे। जो कि भारत को हराने के बाद पुरी दुनिया पर अपना परचम लहराना चाहता था। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि भारत के जीतने का बाद भी वे अपने देश वापिस लौट गया। सभी कारणों को समझेंगे विस्तार से।

Battle of Hydespes

भारत पर यूनानी आक्रमण मकदूनिया के राजा सिकंदर महान द्वारा जिसे हम अलेग्जेंडर द ग्रेट के नाम से भी जानते है के द्वारा 326 ईसा पूर्व में किया गया। भारत से पहले सिकंदर ने ईरान के हखनमी वंश का अंत किया था। इसके बाद उसने भारत के उत्तर पश्चिम हिस्से की ओर अपने विजय संकल्प का प्रारम्भ किया।

Hydespes
यह भारत की प्राचीन एवं प्रसिद्ध झेलम नदी का ईरानी नाम है। दरअसल यह युद्ध इसी नदी के किनारे हुआ था जिसके कारण इस युद्ध को Hydespes का युद्ध य Battle of Hydespes भी कहा जाता है।

प्रारम्भ में भारत में सिकंदर का पहले सामना पंजाब के राजा पुरु जिन्हें हम पोरस के नाम से भी जानते है उससे हुआ। राजा पोरस इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लडे़ लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। सिकंदर पोरस की वीरता से बहुत प्रभावित हुआ जिसके परिणामस्वरूप सिकंदर ने पोरस को उसका राज्य लौटा दिया और उसे अपना सहयोगी बना लिया।

सिकंदर की वापसी का कारण

पोरस से युद्ध के बाद सिकंदर का सामना मगध के शक्तिशाली राजा घनानंद से हुआ। घनानंद नंद राजवंश का एक प्रतापी राजा था। घनानंद की विशाल सेना और हाथियों के डर से सिकंदर के सैनिकों ने व्यास नदी को पार करने से इनकार कर दिया। जिस कारण को सिकंदर को वापिस लौटना पड़ा।

आक्रमण का प्रभाव

1.इस आक्रमण के चलते भारत में गंधार कला शैली का निर्माण हुआ और भारत तथा यूनान के बीच सिधा संपर्क स्थापित हुआ। गंधार कला भारतीय और यूनान की मूर्ति कला का अनूठा मिश्रण है।

2.भारत में पहली बार सूडौल सांचे से ढले सिक्कों का निर्माण हुआ। राजाओं के चित्र वाले सिक्के बनाने की तकनीक यूनानियों द्वार ही भारत लायी गयी।

3.सिकंदर के आक्रमण ने छोटे राज्यों की शक्ति को कुचल दिया। इससे मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्र गुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणाक्य को विशाल और एकीकृत भारतीय साम्राज्य स्थापित करने में मदद मिली।

4.सिकंदर के भारत आने तथा हमलों के चलते सिकंदर के सिपाहियों पश्चिम की और जाने वाले चार नए थल और जल मार्गों की खोज की। इससे भारत का व्यापार और पश्चिम एशिया के देशों के साथ सीधे तौर पर बहुत बढ़ गया।

5.भारतीय राजाओं के समझ में आयी कि युद्ध में भारी भरकम हाथियों पर पूरी तरह से निर्भर रहना नुकसान देह हो सकता है। क्योंकि यूनानी सेना के तेज़ रफ्तार घूड़सवार सेना एवं तीरंदाजों ने हाथियों को अपनी ही सेना में लौटने के लिए मजबूर कर दिया। अतः सिकंदर के युद्ध के बाद भारतीय राजाओं अपनी युद्ध कला में परिवर्तन किया।

शुक्रवार, 29 मई 2026

कुल धारा

kuldhara village

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम कुल धारा जिसे एक शापित गांव भी कहते है इसके पीछे की कहानी को जानेंगे इसके साथ ही इतिहास में इस स्थान पर घटी उस घटना पर प्रकाश डालेंगे जिसके कारण 84 हजार ग्राम वासियों को इस गांव को छोड़ना पड़ा। तथा इस राज़ से भी पर्दा उठायेंगे की यह कोई शापित गांव नहीं था। लेकिन लोगों का रहस्यमय तरीके से गायब होना वर्तमान समय में लोगों को जरूर सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर उस गांव में क्या हुआ था। वर्तमान समय में यह गांव पुरातत्व विभाग के अधीन है जहां सूरज ढलने के बाद रुकने पर सख्त मनाही है। तो आइये तथ्यों के आधार पर इस गांव के उत्थान विनाश और आधुनिक वैज्ञानिक खोजो को समझते है। 

इतिहास

13वीं सदी के समय काल में  राजस्थान के जोधपुर की पाली रियासत के राजा के अत्याचारों और भारी कर से तंग आकर ये लोग जैसलमेर रियासत में आ कर बसना इनकी मजबूरी थी। किताब  तवारीख-ए-जैसलमेर के अनुसार कधान नाम  के इस पालीवाल ब्राह्मण ने कुल धारा की नींव रखी तथा इसका निर्माण किया था । पुरा तात्विक साक्ष्यों में मिले शिलालेखों से यह पता चला है कि यह गांव 800 साल पुराना है। ये पालीवाल ब्राह्माण महान वैज्ञानिक और बेहतरीन सिविल इंजीनियर थे। जिसका प्रमाण हमें जल जमा करने की खादीन प्रणाली से मिलता है। यह तकनीक राजस्थान जैसे इलाके जहां 50 डिग्री से भी अधिक तापमान चला जाता है और बारिश भी कम होती है जगह पर किसी खजाने से कम नहीं थी।

खादीन तकनीक

वे पथरीली ढलान वाले इलाके के नीचे मिट्टी का मजबूत बांध बनाते थे, जिससे बारिश का पानी खेतों में जमा हो जाता था। यह पानी जमीन के नीचे रिसकर कूओं को रिचार्ज करता था। इस रिसाव प्रक्रिया से गुजरने के कारण पानी में से नमक निकल जाता था और पानी खेती और पिने योग्य हो जाता था। जिस कारण से यहां गेहूं और चने की बंपर पैदावार होती थी।

वास्तुकला का अच्छा ज्ञान

कुलाधारा वासियों को वास्तुशास्त्र का अच्छा ज्ञान था जिसके कारण इनके गांव आधुनिक तरीकों से प्लांड सिटी की तरह ग्रिड पैटर्न पर बसा हुआ था। गांव के घर 50 डिग्री की गर्मी में भी प्राकृतिक रुप से ठंडे रहते थे। इसके लिए वे मिट्टी की 1.5 फिट की दीवारें बनाते थे तथा घरों में वेंटिलेशन के लिए आंगन में पत्थरों की खूबसूरत नक्काशीदार जालियां बनाते थे जो हवा को तेजी से ठंडा करती थीं।

पलायान का मुख्य कारण

19 सदी में जैसलमेर में महाराजा मूलराज द्वितीय का शासन था जो कि एक प्रभावशाली राजा नहीं थे उनकी अपेक्षा उनका दीवान ही शासन चलाता था जो कि एक क्रूर दीवान था। दीवान सालिम सिंह मेहता बहुत की अय्याश किस्म का व्यक्ति था। एक दिन उसकी नजर कुलधारा के मुखिया की खूबसूरत बेटी पर पड़ी। उसने जबरन कुलधारा के मुखिया को उसकी बेटी से शादी करने का पैगाम भेज दिया और इनकार करने पर पूरे गांव को प्रताडि़त करने की धमकी दी। अपनी बेटी के सम्मान और समुदाय के सम्मान की रक्षा के लिए रात में गांव में एक गुप्त पंचायत बुलाई गयी जिसमें कुलधारा के 84 गांव के मुखिया शामिल हुए । उन्होंने गुलामी स्वीकार करने की बजाय अपनी 500 साल पुरानी पुरखों की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला लिया और एक ही रात में पूरा इलाका वीराने में बदल गया।

कहानी का दुसरा पहलू

बताया जाता है की सालिम सिंह के पिता स्वरुप सिंह जो की पहले के दीवान थे ने जब पालीवालों पर जबरन टैक्स लगाना चाहा , तो दरबार में हुए विवाद के कारण राजकुमार राय सिंह ने स्वरुप सिंह की हत्या कर दी थी। उस समय सालिम सिंह सिर्फ 11 वर्ष का था। बड़े होकर जब सालिम सिंह दीवान बना तो पालीवालों पर अत्याचार करना सिर्फ उसका लालच नहीं बल्कि दशकों पुराना उसका प्रतिशोध था। खास बात यह है कि यह की यह वृतांत कर्नल जेम्स टाड की किताब Annals and Antiquites of Rajasthan में भी दर्ज है की सालिम सिंह ने कुलधारा वासीयों पर  भारी टैक्स लाद दिए थे जिससे वे पहले ही परेशान थे। बेटी का विवाद इस उत्पीड़न की आखिरी कड़ी थी।

श्राप के पीछे का कारण य कूटनीति

पालीवाल ब्राह्माण अत्यधिक बुद्धिमान थे वे जानते थे कि सालिम सिंह उनकी उपजाऊ भूमि आलीशान गांव पर कब्जा करना चाहता है। चूंकि वे सेना से लड़ नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने श्राप की अपवाह को एक सामाजिक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया। उस समय काल के लोग कुछ ज्यादा ही अंध विश्वासी थे जिसके कारण कुलधारा की जमीन को शापित घोषित करने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई। परिणामस्वरूप कोई भी किसान इन ज़मीनों पर दुबारा बसने नहीं आया। अंत में सालिम सिंह के हाथ सिर्फ खण्डहर लगे।

आधुनिक रिसर्च के प्रमाण

ऐतिहासिक जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार 18 वीं सदी में यहाँ की आबादी करीब 800 थी जो कि 1890 तक धीरे-धीरे घटकर 37 रह गई । यह प्रमाण बताता है कि पलायन एक रात में नहीं बल्कि कई दशकों में हुआ था। पलायन का मुख्य कारण काकनी नदी का सुखना था क्योंकि कुल धारा इसी नदी के तट पर बसा हुआ था जिसके कारण यहीं उनके जीवन यापन का मुख्य स्रोत थी।

2017 की भूकंप थ्योरी

2017 में जर्नल वैज्ञानिक और उनकी टीम का एक रिसर्च पेपर प्रकाशित हुआ। इस पेपर ने उनकी टीम ने खुलासा किया की कुल धारा और खाबा गांव के घरों की छतें, बीम और खंभे एक ही दिशा में गिरे हुए हैं , की एक विनाशकारी भूकंप का स्पष्ट प्रमाण है। संभव है कि अकाल और टैक्स से परेशान लोगों के घर जब भूकंप में ढह गए , तो बची आबादी ने उसी रात हमेशा के लिए इस जगह को छोड़ दिया।2018 में आई आई टी बाम्बे और कई शीर्ष विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों ने रेडियो कार्बन डेटिंग और आधुनिक तकनीकों के जरिए इस गांव के मिट्टी के बर्तनों, अनाज और जली लकड़ियों के नमूनों की जांच शुरु की , ताकि तथ्यों को कहानियों से अलग किया जा सके।

डार्क टुरिज्म और भुतिया दांवों का सच

आज कूलधरा भारत के सबसे बड़े डार्क टूरिज्म स्थलों में से एक है। लोग यहां इतिहास से ज्यादा भूतों की कहानियों और पैरानार्मल गतिविधियों जैसे परछाई दिखना, कदमों की आवाजें, अचानक तापमान गिरना का अनुभव करने आते है। लेकिन मनोवैज्ञानिक सच की बात करें तो वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं के अनुसार जब आप किसी वीरान सुनसान जगह पर यह सोचकर जाते है कि वह भुतिया है तो आपका दिमाग हवा की सरसराहट या किसी जानवर की परछाई को भी डरावना रुप दे देता है।

हमारे विचार से भी कुल धारा गांव सच में श्रापित  है किसी प्रेत आत्मा से नहीं बल्कि शापित था दीवान सालिम सिंह की क्रूरता से, प्राकृती के सुखे मिजाज से और एक विनाशकारी भूकंप से। आज यह गांव उस भूतिया टैग से शापित जो कि इसके निवासियों के महान विज्ञान अद्भुत जल इंजीनियरिंग, और आत्मसम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर करने देने वाले गौरवशाली इतिहास को दबा रहा है। 

मंगलवार, 26 मई 2026

अष्टांग हृदय

ashtanga hridaya

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम आयुर्वेद विज्ञान के सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टांग ह्रदय के बारे में चर्चा करने जा रहे है आयुर्वेद विज्ञान के इस ग्रंथ के साथ ही हम अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथों के बारे में भी जानेंगे। इसके साथ ही हम जानेंगे इस ग्रंथ का इतिहास तथा इसे किन ग्रंथों की छाया प्रति के रुप में सरलीकरण करके प्रस्तुत किया गया है। 

दोस्तों यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि हाल ही में हमने और आपने कफ़ सिरप कांड के बारे से सुना होगा जिसमें लगभग 150 से अधिक नवजात बच्चों कि जाने चली गयीं। हमारे कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसे देश में रहते है जहां मौतें होने के बाद पता चलता है कि हमें यह दवा नहीं खानी है। सोच कर देखें तो जिन छोटे बच्चों का हम जान से भी ज्यादा ख्याल करते है उनकी जान एक दवा खाने से जा रही है और ऐसा भारत जैसे देश में ही नहीं अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी हो रहा कोविड 19 की दवा के दौरान भी ऐसा हो चुका है कम्पनी पर अमेरिकन कोर्ट द्वारा भारी जुर्माना भी लगाया गया था।

मगर सोचकर देखीए इन दवाओं से जिन लोगों की जानें गयी क्या वो लोट कर सकते है नहीं तो ऐसे में हमें खुद से अपने ओर अपने चाहने वालों ख्याल रखना होगा सरकार के भरोसे पड़े रहने से कुछ नहीं होने वाला। हम सलाह देते है आयुर्वेद को अपनाईये हम ऐसा नहीं कहते है आयुर्वेद के नुकसान नहीं है मगर इसका शरीर पर धीरे धीरे असर पड़ता है जिसके कारण जान का खतरा कम रहता है समय से इलाज हो सकता है। रासायनिक सब्जीयों का इस्तेमाल कम करें तथा आर्गेनिक फलों तथा सब्जियों को खाना प्रारम्भ करें और स्वास्थ्य रहें।

इतिहास

यह ग्रंथ आयुर्वेद विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कालजयी ग्रंथ है । इसकी रचना महर्षि वाग्भट्ठ द्वारा छठवीं तथा सातवीं शताब्दी के मध्य कालीन समय में की गई थी। आयुर्वेद के इतिहास में इसे वृहतत्रयी यानी तीन महान ग्रंथ संहिता सुश्रुत संहिता चरक संहिता तथा एक अज्ञात तीसरे ग्रंथ को समा योजित कर एक मुख्य ग्रंथ का रुप दिया गया है । जिसके कारण इस ग्रंथ को वृहतत्रयी भी कहा जाता है। आयुर्वेद के इतिहास में अष्टांग हृदय का आना एक क्रांतिकारी मोड़ था। सबसे पहले इसे आयुर्वेद के दो मुख्य रुपों में बांटा गया। प्रथम आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय।

आत्रेय सम्प्रदाय
यह काया चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है जिसे हम जनरल मेडीसिन के नाम से भी जानते है। इसे चिकित्सा के प्रमुख ग्रंथ चरक संहिता से लिया गया है।

धन्वन्तरि सम्प्रदाय
यह शल्य तन्त्र  पर आधारित है जिसे हम सर्जरी पर आधारित भी मानते है इसे सुश्रुत संहिता से लिया गया है।

यह दोनों ग्रंथ बहुत विशाल थे जिसके कारण आम चिकित्सकों के लिए दोनों का संपूर्ण अध्ययन करना और इन्हें याद रखना काफी कठिन था। ऋषि वाग्भट ने इस समस्या को समझते हुए चरक संहिता की चिकित्सा और सुश्रुत संहिता की शल्यक्रिया के सर्वोत्तम ज्ञान को समेटकर , इसे सरल और काव्यात्मक रुप में पिरोया। उन्होंने आयुर्वेद के आठ अंगों का सार निकालकर इस ग्रंथ की रचना की जिसके कारण इसका नाम आष्टांग हृदय पड़ा।


एक महत्वपूर्ण ग्रंथ क्यों है

इस ग्रंथ में आयुर्वेद के सभी आठ विभागों का ज्ञान एक ही जगह मिल जाता है जिन्हें हम क्रमबद्ध तरीके से नीचे प्रस्तुत कर रहे है
1.काय चिकित्सा जिसे हम जनरल मेडिसिन के नाम भी जानते है
2.बाल चिकित्सा जिसे हम कौमारभृत्य या paediatrics के नाम से भी जानते है।
3.ग्रह चिकित्सा इसे हम भूत विद्या यानी psychiatry or Spiritual healing के नाम से भी जानते है ।
4.ऊध्वाग चिकित्सा यानी शालाक्य तन्त्र य ENT and Ophthalmology को नाम से भी जानते है।
5.दृंष्ट्राचिकित्सा य अगदतन्त्र अथवा Toxicology के नाम से भी जानते है।
6.जरा चिकित्सा य रसायन या Geriatics Rejuvenation के नाम से भी जानते है।
7.वृष्यचिकित्सा य वाजीकरण Aphrodisiac therapy नाम से भी जानते है।
8.शल्य चिकित्सा जिसे हम surgery के रुप में भी जानते हैं।


ग्रंथ की संरचना

इस ग्रंथ में कुल 6 भाग तथा 120 अध्याय है इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के कारण बताए गए है।
1.सूत्र स्थान 
इसके अन्तर गत सिद्धांत दिनचर्या ऋतुचर्या आहार विहार और रोगों के बारे में अध्याय 30  में बताया गया है।
2.सूत्र स्थान
अध्याय 6 के अन्तर गत मानव शरीर की रचना ,गर्भधारण और भ्रूण के विकास के बारे में जानकारी दी गई है।
3.निदान स्थान
अध्याय 16 को अंतर्गत रोगों के लक्षण उनके कारण और बीमारियों की पहचान के तरीके बताए गए हैं।
4. चिकित्सा स्थान
अध्याय 22 के अंतर्गत विभिन्न बीमारियों के नुस्खे दिए गए हैं।
5.कल्प सिद्धि स्थान
अध्याय 66 के अंतर्गत पंचकर्म वमन विरेचन और औषधियों कको बनाने की विधि बताई गई है।
6.अत्तर स्थान
इसमें बाल रोग, आंख कान नाक के रोग मानसिक रोग और विष विज्ञान के बारे में तथा इनकी शाखाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ग्रंथ की भाषा सरल और काव्यात्मक होना

चरक और सुश्रुत संहिता गद्य prose यानी जटिल भाषा में थी लेकिन वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् के श्लोकों में लिखा। अतः छंद में होने के कारण इसके सिद्धांतों और जड़ी-बूटियों के फार्मूला को याद रखना चिकित्सकों के लिए बेहद आसान हो गया।

सूत्र स्थान

शुरुआती अध्याय में आयुर्वेद जगत में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें दिनचर्या यानी डेली रुटीन ऋतुचर्या यानी सिज़नल रुटीन  आहार विहार और रोगों के मूल कारणों को इतनी सटीकता से समझाया गया है कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भी इसका पालन करे तो वे जल्दी बीमार न पड़े।
व्यावहारिक और संक्षिप्त
वाग्भट जी वे पुराने ग्रंथों की अति विस्तृत और दार्शनिक बातों को हटाकर सीधे उपचार और चिकित्सा पर ध्यान केंद्रित किया है इस ग्रंथ में । इस ग्रंथ में दी गई दवाओं योग आज भी सबसे ज्यादा प्रभावी और आसानी से तैयार होने वाले माने जाते है।

वैश्विक स्वीकारता

अष्टांग हृदयम् का महत्व केवल भारत तक सीमित नहीं रहा है इसका प्राचीन काल में ही अनुवाद तिब्बती अरबी फारसी और जर्मन जैसी भाषाओं में हो चुका है। तिब्बती चिकित्सा पद्धति पर तो इस ग्रंथ का बहुत गहरा असर है।

रविवार, 24 मई 2026

मेघनाथ साहा

meghnad saha

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में देश के महान वैज्ञानिक एवं क्रांतिकारी नेता मेंघनाथ साहा तथा उनके द्वारा की गई महत्वपूर्ण खोज के बारे में बताया गया है। ये वही वैज्ञानिक है जिनका नाम 6 नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था मगर नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। कुछ लोग इस के पीछे के कारण उनका छोटी जात का होना मानते है। मगर कुछ विचारकों का मानना है कि इसके पीछे का कारण उनकी खोज के प्रमाणीकरण को सही न मानना था। इसके साथ ही हम इस लेख में उनके नाम पर बनी महत्वपूर्ण स्मारक स्थल के बारे में चर्चा करेंगे।

प्रारम्भिक जीवन 

उनका जन्म 6 अक्तूबर 1893 को शाओराटोली वर्तमान बंगला देश में हुआ था। अपने परिवार के निर्धन होने के बावजूद भी अपनी प्रतिभा के दम पर छात्र वृत्ति हासिल कर अपनी पढ़ाई जारी रखी। इसके साथ ही उन्होंने कलकत्ता प्रेसडेंसी कालेज से शिक्षा हासिल की और पढ़ाई। इनके मित्रों कि सूची में सत्येन्द्र नाथ बोस का नाम आता है। इनके प्रिय शिक्षक की सूची में जगदीश चन्द्र बोस तथ  प्रफुल्ल चन्द्र राय का नाम आता है।

इनके द्वारा किए गए कार्य

1.साहा समीकरण
1920 में इन्होंने साहा आयनीकरण समीकरण का प्रतिपाद किया। यह समीकरण खगोल भौतिकी के बुनियादी स्तंभों में से एक है। इसका महत्व समझें इस समीकरण की मदद से हमें पता चलता है कि किस तरह से किसी तारे जैसे सूर्य के अत्यधिक तापमान के कारण उसके तत्व किस तरह से आयनित यानि lonize होते हैं। इसके साथ ही इस समीकरण की मदद से वैज्ञानिक दूर स्थित तारों के तापमान, दबाव और वहां मौजूद तत्वों जैसे हाई़़ड्रोजन हीलियम की मात्रा का सटीक पता लगाने में सक्षम हुए। प्रसिद्ध खगोल शास्त्री नोरिस रसेल ने इसे गैलीलियो के बाद खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी खोज बताया था।

2.साहा इंस्टीट्यूट आफ न्यूक्लियर फिजिक्स की स्थापना इनके द्वारा कलकत्ता में की गई जो कि परमाणु भौतिकी के रिसर्च का एक प्रमुख केंद्र बना। मेघनाद साहा केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहे ,उन्होंने भारत में विज्ञान के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
3.इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अन्तर गत भौतिकी विभाग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.विज्ञान के प्रचार एवं प्रसार तथा लोगों को विज्ञान के प्रति जागरूक करने के लिए इन्होंने साइंस एंड कल्चर पत्रिका की शुरुआत की।
5.वैज्ञानिक कार्य के साथ ही इन्होंने भारतीय सामाजिक कार्य तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण कार्य किया। भारत में बाढ़ की समस्या के निपटने के लिए दामोदर घाटी परियोजना तथा भाखड़ा नांगल बांध परियोजना की रुप रेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

6.राष्ट्रीय योजना सनिति की स्थापना
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के आग्रह पर भारत के योजनाबद्ध विकास के लिए इस समिति का गठन में अहम भूमिका निभाई जिसके अध्यक्ष बाद में जवाहर लाल नेहरु जी बने।

7.कैलेंडर सुधार में अहम भूमिका निभाई इन्होंने शाक कैलंडर त्रुटि सुधार में महत्वपूर्ण कार्य किया।
8.वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका मानना था कि वैज्ञानिकों की आवाज उठाने के लिए सांसद में एक सीट होने चाहिए जिसके चलते 1952 में उत्तर पश्चिम कलकत्ता सीट से एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रुप में भारी बहुमत से लोकसभा सांसद चुने गए।

निधन

16 फरवरी 1956 तो नई दिल्ली में योजना आयोग के दफ्तर जाते समय दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। मेघनाथ साहा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि कैसे एक व्यक्ति अभावों से उठकर न केवल वैश्विक विज्ञान को नई दिशा दे सकता है, बल्कि अपने देश के विकास में भी अद्वितीय योगदान दे सकता है। 

नोबेल पुरस्कार न का कारण

यह विज्ञान के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद और अन्यायों में से एक माना जाता है। नोबेल पुरस्कार पाने के लिए किसी वैज्ञानिक का नाम आधिकारिक रुप से नामांकित किया जाना जरूरी होता है। मेघनाद साहा का नाम 1930 1937 1939 1940 1951 1955 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। लेकिन कुछ प्रमुख कारणों के चलते हुन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया।

मूल्यांकन कर्ताओं की राय

नोबेल समिति के मुख्य मूल्यांकन कर्ता स्वीडिश भौतिक विज्ञानी कार्ल सीगबान थे। उनका मानना था कि साह कि खोज खगोलीय अनुप्रयोग है न कि शुद्ध भौतिकी मानने में थोड़ा संकीर्ण सोच रखती है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि उनकी खोज सैद्धांतिक है। उन्होंने गणित और भौतिकी के नियमों का उपयोग करके समीकरण दिया था। नोबेल समिति अक्सर उन खोजों को प्राथमिकता देती थी जिनका प्रयोगशाला में व्यावहारिक प्रदर्शन तुरंत हो चुका हो।

राजनीति और वैश्विक समीकरण

1920 से 1950 के बीच का समय काल विज्ञान की दूनिया पर यूरोपीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों का वर्चस्व था। औपनिवेशिक भारत से आने वाले वैज्ञानिकों को वैश्विक मंच पर वह समर्थन नहीं मिल पाता था।

अन्य वैज्ञानिकों की प्राथमिकता

1930 के समय काल में जब साहा का नाम चर्चा में था तब क्वांटम मैकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स में कई अन्य बड़ी खोजें जैसे न्यूट्रान की खोज और पाजिट्रान की खोज पर काम करने वाले वैज्ञानिकों की तरफ ज्यादा चला गया।

प्रसिद्ध वैज्ञानिकों की राय

नोबेल पुरस्कार न मिलने के बावजूद दुनिया के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों ने उनके काम की सरहना की उनके काम को सर्वोच्च माना। ब्रिटीश खगोल शास्त्री सर आर्थर एडिंगटन और नोरेस रसेल जैसे दिग्गजों ने स्पष्ट कहा था कि खगोल भौतिकी में साहा का योगदान किसी भी नोबेल पुरस्कार से कही बढ़कर है। भारतीय विज्ञान जगत में उन्हें हमेशा एक ऐसे नायक के रुप में देखा जाता है जिसने सीमित संसाधनों में ब्राम्हांड के सबसे बड़े रहस्यों को सुलझाया।

शनिवार, 23 मई 2026

शैलेंद्र राजवंश

sailendra dynasty

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम शैलेंद्र राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालेंगे। बताते चलें कि इस राजवंश को कुछ विद्वान भारतीय राजवंश नहीं मानते वहीं कुछ विद्वान हिंदू धर्म से सम्बन्धित होने के कारण भारतीय ही मानते है। शैलेंद्र राजवंश के लोग कट्टर बौध धर्म के अनुयायी थे। इस लेख में हम इस वंश के भारतीय सम्बन्ध तथा इनके साम्राज्य जो कि इंडोनेशिया मलेशिया एवं जावा जैसे देशों फैला हुआ था के बारे चर्चा करेंगे। इतिहास के पन्ने को पलटा जाए तो हमें पता चलता है कि यह राजवंश अपने समय काल में बहुत प्रभावशाली एवं शक्ति शाली हिंदू बौद्ध राजवंश था।

नाम की उत्पत्ति

शैलेंद्र शब्द का अर्थ है पर्वतों का राज हिन्दी में विच्छेदन करें तो हमें पता चलता है कि शैल यानी पर्वत इंद्र देवताओं का राजा इंद्र। आमतौर पर देखा जाए तो इस शब्द का प्रयोग भगवान शिव प्रयोग किया जाता है। इस वंश की उत्पत्ति की बात करें तो इतिहासकारों में इस बात पर मतभेद है कुछ इतिहासकार इन्हें दक्षिण भारत के राजवंश एवं शैल वंश से सम्बन्धित मानते है वही कुछ इतिहासकार इन्हें इंडोनेशिया के मूल निवासी मानते है जिन्होंने भारतीय संस्कृति एवं धर्म को अपनाया था। इनका समय काल 8वीं शताब्दी से 11वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है।

धर्म और भाषा

शैलेंद्र वंश के लोग बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी थे इन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाई। हलांकि इन्होंने कभी हिन्दू धर्म का विरोध नहीं किया। इनके राज्य में शिव के भी उपासक तथा अन्य हिंदू देवताओं के उपासक थे जिसके चलते इन्होंने सप्रंग मन्दिर का निर्माण करवाया था। इन्होंने अपने ग्रंथ संस्कृत भाषा भारतीय पल्लव ग्रंथ लिपि को भी अपनाया। इस वंश के लोग कला प्रेमी भी थे।

बोरोबुदुर स्तूप

इंडोनेशिया के जावा में स्थित यह स्तूप शैलेंद्र राजाओं के संरक्षण में लगभग 780 से 825 ईस्वी के बीच बनाया गया था। जो कि बारीक नक्काशी के साथ-साथ मूर्तिकला एवं वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस स्तूप को यूनेस्को की विश्व धरोहर की सूची में संरक्षित किया गया है। यह दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्तूप है जिसमें नौ प्लेट फार्म तथा बुद्ध की 504 मूर्तियां स्थापित की गईं हैं। इस मंदिर कि दीवारों पर बौद्ध दर्शन को तथा उनके जीवन के महत्वपूर्ण पल को दर्शाया गया है।

चांडी सेवूा candi sewu
यह इंडोवेशिया का दूसरा सबसे बड़ा बौद्ध मंदिर है जो प्रमबानान मंदिर के पास स्थित है।

चांडी कलसन candi kalasan
यह भी जावा का सबसे पुराना मंदिर है जिसे शैलेंद्र राजा ने अपने गुरु और देवी तारा के सम्मान में बनवाया था।

भारत के साथ सम्बन्ध

चोल एवं पाल राजवंश के राजाओं के साथ इस राजवंश के सांस्कृतिक व्यापारिक एवं कूटनीतिक सम्बन्ध थे। बताते चलें कि पाल राजाओं के साथ मिलकर शैलेंद्र वंश के राजा बाल पुत्र देव ने मिलकर मगध यानी बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय में बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए एक मठ मनवाया था। इस योजना को पूर्ण करने के लिए उन्होंने पाल राजा देव पाल से पांच गांवों को दान करने का अनुरोध किया था। इसका उल्लेख नालंदा ताम्र पत्र अभिलेख में मिलता है।

शुरुआती समय में शैलेंद्र राजाओं के भारतीय राजा राजा रज चोल तथा राजेंद्र चोल के साथ अच्छे संबंध थे। मगर राजनीतिक कारणों इनमें विरोध हो गया। विरोध से पहले शैलेंद्र राजा श्री मारविजयोत्तुंगवर्मन ने तमिलनाडु के नागपट्टिनम में चूड़ामणि विहार नामक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था। लेकिन इन राजाओं का समय काल बीतने का बाद चोल राजा राजेंद्र चोल ने शैलेंद्र साम्राज्य के राजा श्रीविजय पर व्यापारिक वर्चस्व चलते नौसैनिक हमला किया था।

नौवीं शताब्दी के समय काल में शैलेंद्र राजवंश का प्रशासन इंडोनेशिया में विस्तृत कम होने लगा जिसके बाद शैलेंद्र राजवंश ने सुमात्रा द्वीप वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित  किए। जिसके चलते सुमात्रा द्वीव के श्री विजय साम्राज्य के भी शासक बन गए और  दोनों साम्राज्य की शक्ति एक हो गई। उपरोक्त कारणों के चलते मलक्का जलडमरुमध्य यानी strait of Malacca के व्यापारिक  मार्ग को अपने नियंत्रण में कर लिया।

वंश के समाप्त होने का कारण

11वीं आते-आते चोल साम्राज्य के लगातार नौसैनिक हमलों तथा जावा के मताराम साम्राज्य के साथ आंतरिक संघर्षों के कारण शैलेंद्र वंश और श्री विजय वंश समाप्त हो गया।
नोट इस लेख सम्बन्धित कोई अन्य जानकारी यदि आपके पास है तो जरूर साझा करें।

गुरुवार, 21 मई 2026

विक्रम संवत

vikram samvat calender

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के इतिहास तथा वर्तमान समय में इसके महत्व के बारे में चर्चा करेंगे। यह भारतीय काल गणना का गौरवशाली प्रतीक है। प्रस्तुत लेख में हम विक्रम संवत के साथ ही शक संवत तथा नवीनतम अंग्रेजी कैलंडर के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही हम देखेंगे की आज भी विक्रम संवत क्यों अंग्रेजी कैलंडर से ज्यादा महत्व रखता है।

इतिहास

भारत की प्राचीन  संस्कृति और सभ्यता विश्व की सबसे समृद्ध और वैज्ञानिक संस्कृतियों में से एक है। हमारी इस समृद्ध विरासत का एक अमूल्य हिस्सा है हमारी काल-गणना यानी कलेक्टर प्रणाली । भारत में प्रचलित विभिन्न कैलंडरों में विक्रम संवत का स्थान सर्वोपरि है। यह केवल तिथियों और  महीनों के बदलने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी गौरवशाली परंपरा, खगोलीय विज्ञान और सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है।

विक्रम संवत की शुरुआत ईसा पूर्व 57 बी सी में हुई थी पौराणिक और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य ने अपनी प्रजा को विदेशी आक्रमणकारियों शकों से मुक्ति दिलाई थी। इस विजय के उपलक्ष्य में और अपनी प्रजा को कर्ज मुक्त करने के उद्देश्य से उन्होंने एक नए संवत की शुरुआत की, जिसे विक्रम संवत कहा जाता है। सम्राट विक्रमादित्य अपने अदम्य साहस और जन कल्याण तथा न्याय प्रियता के लिए जाने जाते थे। 

उनके  द्वारा शुरु किया गया यह विक्रम संवत आज भी भारतीय जन मानस के दिलों में बसा हुआ है।वर्तमान के ग्रेगोरियन कैलंडर से इसकी तुलना करें तो विक्रम संवत उससे 57 वर्ष आगे चलता है। यानी वर्तमान समय में अगर 2026 चल रहा है तो विक्रम संवत में 2026+57 2083 होगा।

वैज्ञानिक एवं खगोलीय आधार

विक्रम संवत पूरी तरह से वैज्ञानिक और खगोलीय गणना  पर आधारित है। जहां अंग्रेजी कैलंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित होता है जिसका अनुमान सो वर्षों का होता है। वहीं विक्रम संवत लूनि सोलर यानी चंद्र सौर प्रणाली पर आधारित होता है। यानी इसमें चन्द्र और सूर्य दोनों की गतियों का सटीक समन्वय होता है।

वर्ष और महीने 

अंग्रेजी महीने के समान ही इसमें भी 12 महीने होते है बस नाम अलग होता है। जैसे चैत्र वैशाख ज्येष्ठ आषाढ़ श्रावण भाद्रपद जिसे भादों भी कहते है इसी के साथ अश्विन कार्तिक मार्गशीर्ष पौष माघ और अन्त में भादों आता है। यहां हम अंग्रेजी महीने का विक्रम संवत में क्या नाम उसके बारे में बताते चलते है। विक्रम संवत में महीने अंग्रेजी महीने के कैलंडर के मध्य से शुरु होता और अगले महीने के मध्य के मध्य के दिनों में समाप्त होता है। बताते चले कि विक्रम संवत कि शुरुआत चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तारीख से होती है।

पक्ष

प्रत्येक महीने को दो पक्षों में बांटा गया है कृष्ण पक्ष यानी अंधेरी रातें तथा शुक्ल पक्ष यानी चांदनी रातें होती है।

अधि मास

इसे हम मलमास के नाम से भी जानते है इसका महत्व देखे तो हमें मालूम है कि हर तीसरा वर्ष एक लीप वर्ष होता है जिसके कारण अग्रेंज़ी महीने में फरवरी 28 की जगह 29 दिनों की हो जाती है मगर विक्रम संवत में एक अलग से महीना जी जोड़ दिया जाता है। जिसे हम पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जानते है। प्रक्रिया दर्शाती है की हमारे प्राचीन खगोल शास्त्री कितने उन्नत थे। इससे ऋतुओं का चक्र कभी बिगड़ता ही नहीं है।

सांस्कृतिक और अध्यात्मिक महत्व

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरु की थी। इसी दिन से चैत्र नव रात्रि का प्रारम्भ होता है जिसमें मां शक्ति की उपासना की जाती है। वसंत ऋतु- यह वह समय होता है जब प्रकृति पुरानी पत्तियों छोड़कर नए पत्तों और फूलों से सजती है। खेतों में फसलें लहलहातीं हैं जो किसानों कि मेहनत ओर खुशहाली का प्रतीक होती है। इसके साथ ही भारत के लगभग सभी त्यौहार जैसे दशहरा दीवाली होली रक्षाबंधन और करवा चौथ विक्रम संवत की तिथियों के अनुसार ही तय किए जाते है।

वर्तमान समय में इस कैलंडर को द्वितीय कैलंडर के रुप में लिया जाता है क्योंकि सरकारी कार्यों में अंग्रेजी कैलंडर का ही प्रयोग किया जाता है। लेकिन एक देश ऐसा भी है जो इस कैलंडर को अधिकारिक राष्ट्रीय कैलंडर के रुप में इस्तेमाल करता है। हम नेपाल देश का सम्मान करते है जिन्होंने हमारी परम्परा का जीवित रखा है। बताते चले कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भी विक्रम संवत का उल्लेख किया गया है।

दर्शकों से अनुरोध है कि आप इस लेख को भले ही ज्यादा लोगों में साझा न करें मगर इस लेख से सम्बन्धित अन्य कोई जानकारी आपको अगर है तो जरूर से साझा करें। क्योंकि मैं भी अभी सिख ही रहा हूं।

शक संवत

यह एक भारतीय राष्ट्रीय कैलंडर है जिसे भारत ने 22 मार्च 1957 में यानि 1 चैत्र 1879 को आधिकारिक रुप से अपनायता गया था। यह कैलेंडर भी विक्रम संवत कि तरह ही चैत्र महीने से प्रारम्भ होता है। इस कैलंडर में भी महीनों के नाम विक्रम संवत के समान ही होते है बस अन्तर इतना है कि इस कैलेंडर में सभी महीने अंग्रेजी कैलंडर के साथ मेल खाते है बस लीप वर्ष में जाकर एक  दिन का अतंर आता है।

बुधवार, 20 मई 2026

ग्रेट वाल आफ इण्डिया

 
great wall of india

प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में भारतीय इतिहास के एक ऐसे सच से पर्दा उठाने जा रहे है जिसके बारे में आप सुनकर चौंक जायेंगे। इस विषय को जानना इस लिए भी जरुरी क्योंकि इसी के कारण भारत देश में शोषण का एक बड़ा सिलसिला जारी हुआ जो कि देश की आज़ादी के बाद ही समाप्त हुआ। आज हम भारत की विकराल दीवार जिसे हम ग्रेट वाल आफ इण्डिया के नाम से भी जानते के बारे में चर्चा करेंगे। वैसे आपने ग्रेट वाल आफ चीन के बारे में सुना होगा, इसके साथ ही राजस्थान के राजा महाराणा कुंभा द्वारा निर्माण कराई गयी दीवार के बारे में भी सुना होगा। जिसकी तुलना ग्रेट वाल आफ चाइना के साथ की जाती है। लेकिन यहां मामला थोड़ा अलग है। ये दीवार तो सुरक्षा के लिए बनाई गयी थी जो कि लगभग 26 किलोमिटर तक फैली थी। मगर आज हम जिस दीवार के बारे में बात करने जा रहे है वो लगभग 4000 किलो मीटर तक फैली थी।

इसके साथ ही इस दीवार का निर्माण किसी ईट या पत्थर से नहीं किया गया था बल्कि कटीली झड़ीयों से किया गया था। इसके साथ ही यह दीवार अंग्रेज़ों की शोषण कारी नीति का एक परिणाम थी। आज के इस लेख में हम इस दीवार के बनाने के पीछे के इतिहास तथा उन कंटीली झाड़ीयों के बारे में चर्चा करेंगे जो आज भी किसानों कि समस्या का मुख्य कारण है।

इतिहास

यह बात उस समय की है जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का राज था। कम्पनी का ज्यादातर कमाई के मुख्य स्रोतों में नमक का नाम भी आता था। इस समय काल के दौरान नमक सोने से भी ज्यादा महँगा था।
कहानी की शुरुआत होती है रेम्बलैस एण्ड रिकलैक्शन आफ इण्डिया नामक किताब से जिसमें एक चौप्टर है ट्रांज़िस्ट ड्युटि इन इण्डिया जिसमें बताया गया कि हजारों मिल लम्बी एक दीवार भारत के नक्शे से गायब हो गई। यहीं से दीवार के बारे में चर्चा जोरों से शुरु हूई। इस किताब के लेखक का नाम मेजर जनरल एच डब्लू सुलेमन था जो 1869 के समय काल के दौरान ब्रिटिश सेना के एक अफसर थे।

इन्होंने अपनी इस किताब में बताया की 1757 प्लासी के लड़ाई के बाद से ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन भारत में शुरु हो गया जो कि 1764 में बक्सर के युद्ध के बाद पुर्णतः स्थापित हो गया । 12 अगस्त 1765  को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय और राबर्ट क्लाइव के बीच इलाहाबाद की संधि हुई जिसके तहत अंग्रजों को शाही मोहर प्रदान की गई। इस मोहर के चलते ईस्ट इण्डिया कम्पनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में कर वसूलने का सरकारी अधिकार मिल गया। कम्पनी पहले से ही नमक के क्षेत्र में व्यापार कर ही रही थी मगर सरकारी मोहर के मिलते ही कम्पनी ने नमक के  मनमाने दाम लेने प्रारम्भ कर दिये।

जिसके परिणाम स्वरूप कम्पनी ने 1784 से लेकर 1785 के समय काल में केवल नमक से 62 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। बंगाल में टैक्स बहुत ज्यादा था वहीं राजस्थान में टैक्स बहुत कम था क्योंकि समुंदर राजस्थान के करीब था अतः नमक आसानी से उपलब्ध हो जाता था। इस दीवार को बनाने का मुख्य कारण यही था कि अगर सस्ता नमक आसानी से बंगाल पहुंच गया था तो ब्रिटीश अधिकारियों का करोड़ों का नुकसान हो जाता। बताते चलें कि इस दीवार का दुसरा नाम लैण्ड कस्टम लाईन था। शुरुआत में यह दीवार  कुछ चुने हुए नाकों तथा चौंकी यों तक सिमीत थी

1834 जी एच स्मीथ ने इस दीवार को उत्तर पश्चिम तक फैलाया। 1869 तक यह लाइन हिमालय के तराई इलाकों से लेकर मद्रास प्रेसीडेंसी तक फैल चुकी थी। इतनी बड़ी दीवार की सुरक्षा करना अंग्रेजों के लिए एक समस्या का कारण बन गया। क्योंकि ईंट पत्थर की दीवार को बनाना और बार-बार मरम्मत करवाना महँगा पड़ रहा था और कांटेदार दीवारों को आसानी से काटा जा सकता था। जिसके चलते टैक्स की सुरक्षा के लिए कम्पनी को सेना को लगाना पड़ा लगभग 24000 सैनिकों तैनात किया गया। सेना के जवान 5 से 12 रुपये में 12 से 14 घण्टे दीवार की सुरक्षा करते । जो समय के साथ साथ कम्पनी को महँगा लगने लगा।

ऐलन एक्टिवियन हुमन allan octavian hume

यह वहीं व्यक्ति है जिन्होने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी 1867 में यह फिनलैण्ड में कस्टन कम्शिनर थे इसके साथ ही ये व्यक्ति वनस्पति विज्ञान के अच्छे ज्ञाता भी था। इसी व्यक्ति ने कम्पनी के सामने पत्थर और ईंट की जगह कंटीली झाड़ियों से दीवार बनाने का प्रस्ताव रखा ताकि लागत को भी कम किया जा सके और काम भी पूरा हो जायें। इनके सुझाव पर विदेशी बबूल, करोंदा और छुई-मुई की बड़ी प्रजाती के पौधों को बाहरी देश से भारत लाया गया।

इन पौधों के काटें इतने तेज़ थे कि कोई भी सुरक्षा कवच भी इनसे ज्यादा बढ़ीयां सुरक्षा नहीं बना सकता था। परिणामस्वरूप इस व्यक्ति के आदेश पर हजारों मिल लम्बी खाईंया खोदी गई और उपजाऊ मिट्टी डाली गयी तथा लाखों बीजों को बोया गया। 1874 को समय तक यह झाड़ीयां 8 से 12 फिट तक लम्बी हो गयीं। हियुंम ने अपने उच्च अधिकारी का सूचना देते हुए लिखा कि यह झाड़ीयां इतनी अभेदय है कि इन्हें इंसान तो क्या चूहा भी पार नहीं कर सकता।

इसके साथ ही सैनिकों की संख्या को भी घटा दिया गया बताते चले कि यहां ब्रिटीश सेना ने फुट डालों और राज करों कि नीति अपनाई थी क्योंकि दीवार कि देख रेख में जो सैनिक लगाये गये थे वे लगभग सभी मुसलमान थे तथा उन्हें अपने मूल निवास से 100 किलो मीटर की दूरी पर तैनात किया गया था। ताकि क्षेत्रीय लोगों के प्रति उनके मन में हमदर्दी की भावना न आ सके। इस दीवार और नमक व्यापार पे ही आधारित एक उपन्यास लिखा गया है जिसे महान लेखक मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखा गया है। जिसका शीर्षक नमक का दरोगा है आपको यह उपन्यास एक बार जरुर पढ़ना चाहिए।

कटीली झाड़ीयों का इतिहास

बताते चले कि उस समय काल में लाई गई यह कटीली झाड़ीयां भारत में आज भी मौजूद है जो कि भारतीय उपजाऊ भूमि की उपजाऊ क्षमता को नुकसान पहुंचा रही है। ऐसे में हमें इन कटीली झाडीयों की पहचान करके इन्हें जड़ से समाप्त करने के प्रयास करने होंगे। हमारे श्रोताओं से निवेदन है कि अगर आप इन्हें अपने खेतों के अगल बगल देखें तो जड़ से निकाल कर जला दें।

विदेशी बबूल
इसे आमतौर पर विलायती किकर के नाम से भी जाना जाता है इस पौधे का वैज्ञानिक नाम Prosopis juliflora है। इसे भारत में दक्षिणी अमेरिका और मैक्सीको से भारत लाया गया है।

हानी
1.इस पौधे की जड़े जमीन के अंदर 50 से 60 मीटर अंदर तक चली जाती है जिसके कारण इन्हें जड़ से मिटाना मुश्किल हो जाता है।
2.यह पौधा एक दिन में 7 लीटर से अधिक पानी सोख जाता है यह अपने से 36 फिट दूर तक के क्षेत्र का पानी सोख जाता है। इसके साथ ही यह पौधा पानी की तलाश में जमीन के नीचे 160 फिट तक जाने में सक्षम है।
3.इसकी पत्तियां और जड़े एक खास प्रकार का कैमीकल छोड़ती है जिसके कारण इसके अगल बगल कोई अन्य पौधा या जंगली घास नहीं उग पाती। बताते चले कि अगर कोई जानवर इसे अगर अधिक मात्रा में खा ले तो उसके पेट में सुजन आ जाती है, इसके साथ ही जानवर के दांत झड़ सकते है गम्भीर परिणामों कि बात करें तो इससे जानवर की मौत भी हो सकती है।

mimosa pigra
यह पौधा मूल रुप से दक्षिणी और मध्य अमेरिका से लाया गया है यह दरअसल छुई -मुई पौधे का विक्राल रुप है इसके साथ ही यह छुई मुई के पौधे से थो़ड़ा अलग है। छोटी छुई मुई जमीन पर फैलने वाला एक छोटा पौधा है। मगर यह विशाल ,कांटेदार और बेहद आक्रामक पौधा होता है। इसकी लम्बाई 6 मीटर से 20 फीट की उंचाई तक हो सकती है। छुने पर इसकी भी पत्तीयां सिकुड़ जाती है।

हानी
1.यह दुनिया की 100 सबसे बड़ी आक्रामक झाडियों में से एक है। यह ज्यादातर नदी के किनारे , नहर के किनारे उगता है और तेज़ी से फैलता है जिसके कारण नदी स्रोत तथा दलदली इलाका इससे ढक जाता है। जानवर आदि पानी की तलाश में इसके फंदे में फस कर मर जाते है।
2.यह झाड़ी जहां उगती है उस जगह पर धूप सिधी जमीन पर नहीं आ पाती जिसके कारण स्थानीय वनस्पति समाप्त हो जाती है। नदियों और नहरों के किनारे अत्याधिक मात्रा फैलने के कारण ये पानी के बहाव के रोक देती है। इसके साथ ही इसके बीज पानी में गिरकर दूर दूर तक फैल जाते है।
3.यह पौधा 23 सालों तक  जीवित रहता है। धान की खेती को यह अत्यधिक नुकसान पहुंचाता है।

मंगलवार, 19 मई 2026

भोज शाला

bhojshala
प्रस्तावना

प्रस्तुत लेख में हम मध्य प्रदेश धार ज़िले में विद्दमान भोजशाला के बारे में बात करेंगे। इसके साथ ही राजा भोज तथा मंदिर के निर्माण के पीछे के रहस्य तथा वर्तमान समय में यह चर्चा का विषय क्यों बना हुआ है इस विषय पर बात करेंगे। हाल ही में समय में इंदौर हाई कोर्ट ने इस भोज शाला पर एक ऐतिहासिक फैसला दिया है इस फैसले के वर्तमान परिणामों के बारे में चर्चा करेंगे। यह विषय इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ए एस आई यानी आरकोलोजिकल सर्वे आप इण्डिया द्वारा संरक्षित किया गया है इसके साथ ही यह ऐतिहासिक पुरातत्व स्थल भी है।

भोज शाला

हिंदू समुदाय के लोगों का मानना था कि इस भोज शाला को परमार वंश के राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था जिसे शारदा सदन के नाम से भी जाना जाता है। राजा भोज के समय काल में इस भोज शाला में संस्कृत भाषा का पठन पाठन किया जाता है इसे संस्कृत विश्वविद्यालय माना गया था। इसी भोज शाला में वाग्देवी का एक मंदिर भी था जिन्हें हम मां सरस्वती के नाम से भी जानते है। अतः इस मंदिर के कारण ही इस परिसर के शारदा सदन भी कहा जाता था। 

कालांतर में मुस्लिम शासक महमुद शाह खिलजी ने 1457 में शारदा सदन के तुड़वाकर वहां  मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। समय अन्तराल के बाद इस मस्जिद में मौलाना कमालुद्दीन नामक मुस्लिम व्यक्ति आ कर रहने लग गये । जब कमालुद्दीन का निधन हो गया तब मुस्लिम मान्यताओं के अनुसार इस परिसर को मौलाना कमालुद्दीन की मस्जिद एवं उसके परिसर के नाम से जाना जाने लगा था। जिसके कारण यह विवाद कई वर्षों से उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। उपरोक्त कारणों से यह हिन्दू- मुस्लिम विवाद का मुख्य कारण बना हुआ था।

हाई कोर्ट का फैसला

15 मई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय की इंदौर खण्ड पीठ द्वारा सुनाया गया जिसमें न्यायालय ने कहा की यह वास्तव में राजा भोज द्वारा निर्मित भोज शाला ही है न की कोई मस्जिद। इस फैसले को सुनाने से पहले हाई कोर्ट की बैंच ने ए एस आई द्वारा क्षेत्र विशेष पर किए गए अध्ययन कि रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें प्राचीन मंदिर के होने के साक्ष्य मिले थे। अतः कोर्ट का फैसला हिन्दू समाज के पक्ष में आया। अब वे इस परिसर में बिना रोक टोक के पुजा अर्चना कर सकते है। वर्तमान समय में देखा जाये तो ऐसे बहुत से स्थल विवाद पूर्ण हैं जिनमें से बहुत से स्थलों पर मुकदमा कोर्ट में विचाराधीन है।

सोर्स

15 मई 2026 को टाईम्स आफ इण्डिया ने इस फैसले का प्रकाशन अपनी रिपोर्ट में शीर्षक Bhojhsala complex is temple of goddess vag devi, Hindus have right to woship Madhya Pradesh high court के साथ प्रकाशित किया। इसके साथ ही इसका विडियों संस्करण जिसे 18 मई 2026 को प्रकाशित किया जिसमें परिसर में मां सरस्वती की नवीनतम मूर्ति स्थापना तथा पुजा अर्चना करते हुए दिखाया गया है।

17 मई 2026 को द हिन्दू पत्रिका ने भी शीर्षक Madhya Pradesh bhojshala case and the crack in the places of worship Act के नाम से प्रकाशित किया गया है।